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Varanasi News: बिन पग धोये नहीं गंगा पार करइहो... यूं नहीं नाव चढ़इहो...

Mon, 05 Oct 2026 12:34 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 05 Oct 2026 12:34 AM IST
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You cannot cross the Ganges without washing your feet... you cannot board the boat just like that...
रामनगर की रामलीला में चित्रकूट में ग्रामवासी मिलन प्रसंग का मंचन करते पात्र। संवाद
रामनगर/वाराणसी। रामलीला के दसवें दिन रविवार को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गंगा और यमुना पार कर चित्रकूट पहुंचने की मनोहारी लीला का मंचन किया गया। गंगा तट पर प्रभु श्रीराम और केवट के बीच का संवाद लीला का प्रमुख आकर्षण रहा। जब वन गमन के दौरान प्रभु ने केवट से पार ले जाने का आग्रह किया तो साधारण नाविक केवट ने बिना चरण धोए उन्हें नाव पर बिठाने से साफ इनकार कर दिया। अहिल्या उद्धार की कथा स्मरण करते हुए उसे डर था कि प्रभु के स्पर्श से कहीं उसकी आजीविका का एकमात्र साधन यानी नाव भी स्त्री न बन जाए।
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केवट के अनन्य प्रेम और दृढ़ हठ को देखकर प्रभु श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराए और उसे पांव धोने की अनुमति दे दी। केवट ने काठ के कठौते में गंगाजल भरकर श्रद्धापूर्वक प्रभु के चरण पखारे, चरणामृत ग्रहण किया और पूरे आदर के साथ श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को नाव में बैठाकर गंगा पार कराया। नदी पार करने पर जब प्रभु ने उतराई के रूप में अपनी मुद्रिका (अंगूठी) देनी चाही तो केवट ने यह कहते हुए विनम्रतापूर्वक मना कर दिया कि लौटते समय प्रभु जो भी देंगे, वह उसे प्रसाद मानकर स्वीकार करेगा।
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गंगा पार करने के बाद निषादराज के आग्रह पर प्रभु उन्हें साथ लेकर आगे बढ़े और पावन संगम नगरी प्रयाग पहुंचे। त्रिवेणी स्नान के पश्चात वे महर्षि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे, जहां रात्रि विश्राम कर आगे के मार्ग का परामर्श लिया। मुनि के शिष्यों के मार्गदर्शन में यमुना पार करते हुए प्रभु ग्रामीणों से मिले और अंततः महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे। महर्षि वाल्मीकि ने प्रभु के दर्शन पाकर स्वयं को धन्य माना और उनके वनवास हेतु चित्रकूट पर्वत को सर्वथा अनुकूल स्थान बताया। चित्रकूट पहुंचते ही देवताओं ने कोल-भील का वेष धारण कर प्रभु की सेवा की और थाई विश्वकर्मा के सहयोग से उनके लिए एक सुंदर कुटिया का निर्माण किया। जयकारों और भव्य आरती के साथ दसवें दिन की रामलीला को विश्राम दिया गया।
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