World Suicide Prevention Day 2020: जीवन अनमोल, आत्महत्या नहीं है समाधान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर रोज अखबारों की सुर्खियां बनती आत्महत्याओं की खबरें समाज विकास की विडंबना पूर्ण एवं त्रासद तस्वीर को बयां करती हैं। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है। इसका दंश वे झेलते हैं, जिनका कोई अपना आत्महत्या करके चला जाता है।
उनके प्रिय जन रिश्तेदार एवं मित्र तो दुखी होते ही हैं, संपूर्ण मानवता भी आहत एवं शर्मसार होती है। डरावनी स्थितियों को कम करने के लिए एवं आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। आज हम वाराणसी के कुछ ऐसे लोगों से रूबरू होंगे जिन्होंने कभी आत्महत्या करने की सोची, लेकिन अपनों के प्यार के बल खुद को नई जिंदगी दी है।
केस-1
नौकरी जाने पर खा लिया जहर
सुंदरपुर निवासी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी बताते हैं कि लॉकडाउन में कंपनी ने मुझे काम से निकाल दिया। परिवार घर की जिम्मेदारी और घर की ईएमआई के खर्च ने मुझे ऐसा मानसिक अवसाद की ओर मोड़ दिया कि मैंने जहर खा लिया। लेकिन ऐन वक्त पर पत्नी ने मेरे माता-पिता को बुलाकर मुझे अस्पताल में भर्ती कराया।
डॉक्टरों ने मुझे बचा लिया, लेकिन मैं काफी अफसोस में था। पत्नी और माता-पिता ने जब समझाया तो लगा कि मैंने जिंदगी की सबसे बड़ी भूल आत्महत्या का कदम उठाकर की थी।
केस 2
नंबर कम आने पर आत्महत्या का प्रयास
निजी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी ने बताया कि बारहवीं बोर्ड परीक्षा में मेरे अंक बहुत कम थे। मैंने 90% अंक सोचे थे लेकिन 70% ही आ सके। घर पर माता-पिता ने कभी भी मुझे नंबर कम आने पर कुछ भी नहीं कहा। लेकिन मुझे यह लगा क्लास में मेरी रेपुटेशन बिगड़ गई।
दोस्त मेरा मजाक उड़ाएंगे, इससे बचने के लिए एक दिन मैंने कमरे में ही आत्महत्या का प्रयास किया। लेकिन सही वक्त पर पापा ने आकर मुझे समझाया और मुझे बचा लिया। उस दिन जो मुझे नया जीवन मिला उसकी बदौलत आज मैं अच्छी कंपनी पर एक अच्छे पद पर कार्यरत हूं।
दिमाग में भटकती सिरोटोनिन की चाल
आत्महत्या का सीधा संबंध दिमाग से है। तनाव, मानसिक अवसाद के कारण व्यक्ति के दिमाग में सिरोटोनिन हार्मोन का स्तर घटने लगता है। सिरोटोनिन का स्राव बढ़ते ही तनाव तेजी से बढ़ता है और व्यक्ति को लगता है कि आत्महत्या कर लूं।
कुछ खुद पर काबू पाकर इस स्थिति से बच जाते हैं। मगर कई आत्महत्या के प्रयास में सफल हो जाते हैं। इससे बचने के लिए सतर्क रहें, तनाव की दवा लें, काउंसलिंग कराएं। इससे सुसाइड की टेंडेंसी कम होगी। - डॉ. पल्लवी गुप्ता, मनोचिकित्सक
युवा कर रहे अधिक आत्महत्या
आत्महत्या के आंकड़ों में बड़ी संख्या युवाओं की है। आत्महत्या के 70 प्रतिशत केस 40 साल से कम आयु के युवाओं के हैं। सहनशीलता की कमी इसका बड़ा कारण कारण है। मानसिक अवसाद, तनाव घरेलू झगड़े, बेरोजगारी, निजी संबंधों में खटास, पढ़ाई, नौकरी या तनाव व नशे की लत प्रमुख कारण हैं। - डॉ. संध्या ओझा, मनोचिकित्सक
इन बातों का रखें ध्यान
जब भी आत्महत्या का विचार आए तो किसी अपने से बात करें। उन चीजों की तलाश करें जो आपको खुशी देती हैं। याद रखें कि कई लोगों को खुदकुशी करने के विचार कभी-कभी आते हैं और उनमें से काफी लोग उनसे बचने का हल ढूंढ लेते हैं। इसलिए अपनी समस्याओं को दूसरों के साथ शेयर करें। अपने आसपास किसी बंदूक, चाकू या किसी खतरनाक हथियार या ड्रग आदि को न रखें। - डॉ. अंशुल जायसवाल, मनोचिकित्सक
एसपीजी दे रहा नया जीवन
कभी-कभी इंसान के जीवन में होने वाली घटनाएं उसे इतना प्रेरित करती हैं। जिससे उसके जीवन को एक नई दिशा मिल जाती है। कुछ ऐसा ही हुआ बीएचयू से मनोचिकित्सा में परास्नातक करने वाले छात्रों के साथ। हॉस्टल में रहते हुए उनके कई दोस्तों ने आत्महत्या कर ली। जिसके बाद इन छात्रों ने ठाना कि वह लोगों को आत्महत्या के प्रति जागरूक करेंगे।
इसके लिए उन्होंने सुसाइड प्रीवेंशन गैंग बनाया। जिसके जरिए वह लोगों को काउंसलिंग करते हैं और डिप्रेशन और आत्महत्या जैसी चीजों से बाहर निकलते है। इस ग्रुप में प्रशांत, अनंत पांडे, दीपक कुमार, प्रसून, स्मृति, श्वेता, विशिष्टता, सौरभ, उत्कर्ष, शुभम पटेल हैं। 2018 में बनी एसपीजी अब तक 50 से अधिक लोगों को नई राह दिखा चुकी है।