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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ballia News ›   story of struggles of seven-year-old Ragini from Ballia who hops on one leg to get to school

पैर एक है, हौसला पूरा आसमानः थकती है, बैठती है फिर चल पड़ती है, एक पैर पर स्कूल जाती है सात साल की बच्ची

Wed, 02 Sep 2026 12:18 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, बलिया।
अमर उजाला नेटवर्क, बलिया। Published by: Pragati Chand Updated Wed, 02 Sep 2026 12:18 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक सात साल की बच्ची ने बचपन में हादसे में अपना एक पैर खो दिया, लेकिन उसके हौसले आज भी बुलंद हैं। वह एक पैर पर सैकड़ों छलांग लगाकर रोज स्कूल पहुंचती है। 

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story of struggles of seven-year-old Ragini from Ballia who hops on one leg to get to school
एक पैर से दिव्यांग रागिनी एक पैर से छलांग लगाकर जाती है स्कूल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किसी के लिए घर से स्कूल तक का 400 मीटर का रास्ता महज चंद मिनटों का सफर है, लेकिन सात वर्षीय रागिनी राजभर के लिए यह दूरी रोज एक बड़ी परीक्षा बन जाती है। एक पैर से दिव्यांग रागिनी जब स्कूल के लिए निकलती है तो उसकी हर छलांग उसके हौसले की कहानी बयां करती है। रास्ते में थककर बैठती है, कुछ देर सांस लेती है और फिर हिम्मत जुटाकर एक पैर के सहारे कूदते हुए विद्यालय की ओर बढ़ जाती है।

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रागिनी शिक्षा क्षेत्र मनियर के प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में कक्षा एक की छात्रा है। बचपन में सड़क हादसे में उसने अपना एक पैर खो दिया। परिवार ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार इलाज कराने का पूरा प्रयास किया, लेकिन पैर ठीक नहीं हो सका। आर्थिक तंगी के बीच परिवार बेटी के लिए कृत्रिम अंग या ट्राई साइकिल की व्यवस्था भी नहीं कर सकी।
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दूसरे बच्चों को स्कूल जाते देख रोती थी रागिनी
रागिनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती विद्यालय तक पहुंचना थी। घर से स्कूल की दूरी करीब 400 मीटर है। सामान्य बच्चों के लिए यह दूरी आसान है, लेकिन रागिनी को एक-एक छलांग भरने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। शुरुआत में माता-पिता उसे अकेले स्कूल भेजने से डरते थे। जब मजदूरी से समय मिलता तो उसे गोद में उठाकर विद्यालय पहुंचा देते थे। काम पर जाने के बाद रागिनी घर में ही रह जाती। पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाते देखकर वह रोने लगती थी। उसके मन में भी पढ़ने और स्कूल जाने की ललक थी। आखिरकार रागिनी ने खुद ही तय कर लिया कि वह भी स्कूल जाएगी। गोद का सहारा नहीं मिला तो उसने अपने एक पैर को ही सहारा बना लिया। अब वह रोज एक पैर से कूदते हुए स्कूल जाती है। रास्ते में थकान बढ़ने पर बैठकर कुछ देर आराम करती है और फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाती है।

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हादसे ने छीना पैर, हौसला नहीं
रागिनी की मां बबीता बताती हैं कि बचपन में वह बेटी को इलाज के लिए बलिया लेकर गई थीं। लौटते समय हालपुर के पास आमने-सामने बाइक की भिड़ंत हो गई। हादसे में रागिनी का एक पैर गंभीर रूप से जख्मी हो गया और काफी प्रयास के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका। रागिनी के पिता देवेंद्र राजभर मजदूरी करते हैं। सीमित आमदनी में परिवार का खर्च चलाना ही मुश्किल है। ऐसे में बेटी के लिए कृत्रिम अंग या ट्राई साइकिल खरीदना परिवार के लिए संभव नहीं है। मां चाहती हैं कि बेटी दूसरे बच्चों की तरह पढ़े और अपने पैरों पर खड़ी हो।

विद्यालय ने बढ़ाया मदद का भरोसा
प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा के प्रधानाध्यापक अमित पाल यादव ने बताया कि रागिनी का हाल ही में कक्षा एक में पंजीकरण हुआ है। इसी कारण अभी तक उसे दिव्यांग बच्चों के लिए मिलने वाली सरकारी सुविधाएं नहीं मिल सकी हैं। विभाग से सुविधा उपलब्ध होते ही उसे दिलाने का प्रयास किया जाएगा।

बीएसए ने लिया संज्ञान, कृत्रिम अंग और छात्रवृत्ति का भरोसा
रागिनी की कहानी सामने आने के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने मामले का संज्ञान लिया है। उन्होंने रागिनी को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने के साथ ही प्रतिमाह 2000 रुपये की छात्रवृत्ति दिलाने का भरोसा दिया है। रागिनी की कहानी सिर्फ एक दिव्यांग बच्ची के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि उस जिद और हौसले की मिसाल है जो परिस्थितियों से बड़ी होती है। उसके पास चलने के लिए भले ही एक पैर है, लेकिन पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का सपना पूरा करने के लिए उसका हौसला कम नहीं हुआ है। अब जरूरत है कि आश्वासन जल्द हकीकत में बदले और रागिनी को समय पर कृत्रिम अंग व अन्य जरूरी सुविधाएं मिलें। ताकि 400 मीटर का यह संघर्षमय रास्ता उसके सपनों की राह में बाधा न बने।

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