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विक्रमादित्य महानाट्य: इंजीनियरिंग कर रही राजकुमारी की भूमिका निभाने वाली प्रियल, पढ़ें इनकी जीवंत दास्तान

Sun, 05 Apr 2026 02:45 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 05 Apr 2026 02:45 PM IST
सार

Varanasi News: वाराणसी बीएलडब्ल्यू स्थित सूर्य सरोवर में आयोजित सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य में विभिन्न राज्यों के कलाकार आए हैं। अमर उजाला से बातचीत में इन्होंने अपने विचारों और उत्साह को साझा किया।

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Vikramaditya Mahanatya Priyal Princess Pursuing Engineering Read Vivid Stories of Cast
रानी का अभिनय करती युवती। - फोटो : संवाद

विस्तार

काशी की सांस्कृतिक धरती इन दिनों इतिहास की गूंज से भरी हुई है। उज्जैन से आए “सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य” के कलाकार तीन दिवसीय मंचन के लिए वाराणसी पहुंचे हैं। बीएलडब्ल्यू मैदान में हो रहे इस भव्य लाइट एंड साउंड ड्रामा में कलाकार केवल अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि सम्राट विक्रमादित्य के युग, उनकी चेतना और उनके आदर्शों को जी रहे हैं।

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इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहीं प्रियल सुनानिया इस नाटक में राजकुमारी की भूमिका निभा रही हैं। लगभग आठ-नौ वर्षों से रंगमंच से जुड़ी प्रियल बताती हैं कि उनकी रंगमंचीय यात्रा संयोग से शुरू हुई थी। वे डांस के लिए आई थीं, लेकिन निर्देशक ने उन्हें इस भूमिका के लिए चुन लिया। धीरे-धीरे अभिनय ही उनकी पहचान बन गया। उनके लिए यह नाटक केवल अभिनय नहीं, बल्कि इतिहास को जीने का अवसर है।

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महानाट्य में ले रहे हिस्सा

इन कलाकारों के लिए रंगमंच पेशा नहीं, साधना है। यह नाटक उनके लिए महज प्रस्तुति नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आत्मा से जुड़ने का माध्यम है। हर कलाकार अपने किरदार में उतरते हुए कहीं न कहीं सम्राट विक्रमादित्य के व्यक्तित्व और उनके आदर्शों से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है।

उज्जैन के नवीन यादव इस महानाट्य में खरोश्त की भूमिका निभा रहे हैं और वर्ष 1998 से रंगमंच से जुड़े हैं। बीकॉम की पढ़ाई करने वाले नवीन ने बचपन से अभिनय शुरू किया। मॉडलिंग से करियर की राह पकड़ी, फिल्मों में काम किया, लेकिन अंततः थियेटर ही उनकी पहचान बना। 

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हैदराबाद और दिल्ली तक अपनी प्रस्तुति दे चुके नवीन कहते हैं कि लाइट एंड साउंड ड्रामा में अभिनय करना एक अलग ही अनुभव है। किरदार निभाते-निभाते वे स्वयं भी उसी मानसिकता में उतर जाते हैं और मंच से उतरने के बाद भी उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।

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रंगमंच को बताया साधना

सम्राट विक्रमादित्य की भूमिका निभा रहे उज्जैन के विक्रम सिंह चौहान पिछले 20 वर्षों से रंगमंच से जुड़े हैं। वर्ष 2017 से वे यह किरदार निभा रहे हैं। उनके लिए यह भूमिका अभिनय नहीं, साधना है। 

वे बताते हैं कि मंच पर आते ही कई बार उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वे वर्तमान में नहीं, बल्कि उसी ऐतिहासिक युग में खड़े हैं। कुछ क्षणों के लिए वर्तमान का बोध समाप्त हो जाता है और ऐसा लगता है मानो विक्रमादित्य स्वयं उनके भीतर जीवित हो उठे हों। 

पहली बार वाराणसी आए विक्रम ने काशी विश्वनाथ और घाटों की आध्यात्मिकता को अपने जीवन का विशेष अनुभव बताया। आठ वर्ष की उम्र से रंगमंच से जुड़ी परिधि मानती हैं कि थियेटर ने उन्हें अनुशासन, आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की शक्ति दी है। उनके अनुसार सिंहासन की हर पुतली केवल कहानी नहीं सुनाती, बल्कि जीवन का एक संदेश देती है।

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