काशी से सुषमा का था दिल का रिश्ता, विदेश मंत्री रहने के दौरान कराया प्रवासी भारतीय सम्मेलन का आयोजन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के मंगलवार रात आकस्मिक निधन से काशी भी शोक में डूब गई। एक बारगी तो हर कोई इस दुख भरी खबर को नकारना चाहता था। मगर, निधन की पुष्टि के बाद काशी में भी शोक पसर गया। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का काशी से दिल का नाता था और यहां ज्यादातर लोगों से उनके पारिवारिक रिश्ते भी थे।
बनारस से उनके जुड़ाव के चलते ही विदेश मंत्री रहने के दौरान अपने कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय आयोजन प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी) पर दुनिया भर के भारतवंशियों को काशी बुलाया था। पीबीडी में दुनिया भर को लोगों को काशी में आमंत्रित करने के लिए उन्होंने कई विदेश दौरे किए थे। काशी में अंतिम बार वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार में आई थीं और यहां बेटियों का उत्साह बढ़ाया था।
भाजपा नेता धमेंद्र सिंह बताते हैं कि 15 मई 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में महिलाओं की बाइक रैली को हरी झंडी दिखाने आई तत्कालीन विदेश मंत्री ने पूरी सरकार को पांच कसौटी में कसा था। अपने तर्कों से उन्होंने मोदी है तो मुमकिन है का नारा महिलाओं के बीच बुलंद कराया था। बाइक रैली में उनकी मौजूदगी ने महिला कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया था और उन्होंने अपने संबोधन में जमीनी कार्यकर्ता के रुप में कई उदाहरण प्रस्तुत किए थे।
पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बनारस से गहरे जुड़ाव के चलते उनका समय-समय पर यहां आगमन होता रहता था। पूर्व विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के चुनाव प्रचार में 2007 में काशी आई थीं और डीएलडब्ल्यू मैदान में उनकी जनसभा हुई थी। उस समय उन्हें सुनने वालों की भीड़ यहां उमड़ गई थी। रैली के दौरान मैदान खचाखच भर गया था और सुषमा स्वराज ने कहा था कि काशी का प्यार उनके अंतिम समय तक दिल में रहेगा।
पीबीडी के जरिए दिलाई काशी को अलग वैश्विक पहचान :
विदेश मंत्रालय की ओर से प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाले प्रवासी भारतीय दिवस को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पहल पर 2019 में काशी में आयोजित किया गया। यह पहला मौका था जब पीबीडी देश और राज्य की राजधानी से अलग किसी शहर में होना था। मगर, विदेश मंत्री के रुप में सुषमा स्वराज ने पूरे आयोजन पर खुद निगाह रखी थी। इस आयोजन में दुनिया भर के भारतवंशियों के बीच बदलते बनारस को वैश्विक पहचान दिलाई। वो आयोजन से एक महीने पहले 25 दिसंबर 2018 को काशी पहुंची थी और एयरपोर्ट से सीधे बड़ा लालपुर स्थित हस्तकला संकुल पहुंच गई थी। उस दौरान विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह (रि.) ने उनसे कहा था कि आप यात्रा करके आई हैं थोड़ा आराम कर लीजिए, तो सुषमा स्वराज ने कहा था जनरल साहब अब तो मेहमानों के जाने के बाद ही आराम होगा। स्थानीय अधिकारी बताते हैं कि आयोजन से पहले मेहमानों से जुड़ी तैयारियों का निरीक्षण किया था और कई खामियों को सुधारने के लिए खुद पहल कराई थी।
दो दिन काशी को बनाया था :
21 से 23 जनवरी 2019 को आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन में तत्कालीन सुषमा स्वराज दो दिन तक काशी में रहीं थीं और दूसरे दिन उनकी ओर से डिनर भी आयोजित किया गया था। पूरे आयोजन में उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें आयोजन से जुड़े छोटे कर्मचारियों के नाम तक याद थे। इस दौरान उन्होंने कहा भी था कि काशी तो मेरे दिल में है और भारत को दिशा भी काशी से मिलती है।
मंडलायुक्त दीपक अग्रवाल ने बताया कि प्रवासी भारतीय दिवस के दौरान ही कई बार उनसे मिलने का मौका मिला। उनके स्वभाव में मातृत्व और व्यवहार अभिभावक की तरह था। उनका अध्ययन इतना अच्छा था कि हर पहलु पर उन्हें डिटेल जानकारी होती थी। हर आयोजन में उनकी व्यक्तिगत रुचि होती थी। उनके निधन का समाचार सुनकर आघात सा लगा है।
पूर्व विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव ने बताया कि अभी कुछ दिन पहले ही उनसे मेरी बात हुई थी तो वो बोलीं सब ठीक है और ईश्वर का आशीर्वाद है। असमय उनका जाना देश के लिए अपूरणीय क्षति है। मेरा उनका कई दशक से घर का नाता था। जब भी काशी आती थीं तो बिना मुलाकात के वापस नहीं गईं। बनारस तो उनका घर ही था और हमने अभिभावक खो दिया।
एमएलसी अशोक धवन ने कहा कि सुषमा जी का स्नेह कई दशकों से हमें मिलता रहा था। जनसंघ से उनके जुड़ाव का नतीजा था कि हमेशा वे हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करती थीं। राजनीति में उनकी मिसाल तो विपक्ष के नेता भी देते हैं। अगर कहा जाए तो वे राजनीति में अजातशत्रु थीं। उनका असमय जाना देश भर के लोगों के लिए बहुत बड़ा नुकसान है।
भाजपा के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह ने कहा कि 2007 में भाजपा नेता सुषमा स्वराज से पहली बार मिला था। इसके बाद विदेश मंत्री बनने के बाद जब मैं मिला तो उन्होंने मुझे पहचान लिया था। प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन में वे कार्यकर्ताओं से भी फीडबैक लेती थी। काशी प्रवास में उनका सानिध्य मिला था और उनके विशाल व्यक्तित्व की कमी पूरी नहीं हो सकती।