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Varanasi : अब बीएचयू में मिल सकेगा स्पाइनल कॉर्ड इंजरी का बेहतर इलाज, 12 साल पुराने शोध पर काम शुरू

Thu, 18 Jan 2024 05:15 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 18 Jan 2024 05:15 AM IST
सार

आईएमएस की पूर्व प्रोफेसर प्रो. सरोज चूड़ामणि ने 79 वर्ष की उम्र में रिसर्च शुरू कर दिया है। उन्होंने आईआईटी कानपुर दाखिला लिया है। उनका कहना है कि नए शोध से स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के इलाज की राह आसान होगी। यह शोध 12 साल पुराना है। अब इसे अंतिम रूप देना है।

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Varanasi: Now better treatment for spinal cord injury will be available in BHU
demo pic... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

स्पाइनल कॉर्ड इंजरी का बेहतर इलाज जल्द ही बीएचयू में मिल सकेगा। आईएमएस की पूर्व प्रोफेसर प्रो. सरोज चूड़ामणि ने 79 वर्ष की उम्र में रिसर्च शुरू कर दिया है। उन्होंने आईआईटी कानपुर दाखिला लिया है। उनका कहना है कि नए शोध से स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के इलाज की राह आसान होगी। यह शोध 12 साल पुराना है। अब इसे अंतिम रूप देना है।

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आईआईटी कानपुर में बायोलॉजिकल साइंसेज एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग से शोध कर रहीं प्रो. सरोज के मुताबिक, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी गंभीर समस्या के रूप में उभर रही है। दुर्घटनाओं में घायल होकर बीएचयू आने वाले 15 से 20 लोगों को ऐसी समस्या रहती है। चिंता की बात यह है कि देश भर में एक साल में एक लाख से अधिक इस इंजरी के नए मरीज आते हैं। बीएचयू में हर महीने पांच से दस हजार पीड़ित आते हैं। स्पाइनल कॉर्ड नसों का वह समूह है, जो दिमाग का संदेश शरीर के अन्य अंगों खासकर हाथ और पैर तक पहुंचाता है। ऐसे में अगर स्पाइनल कॉर्ड में चोट लग जाए तो यह पूरे शरीर के लिए घातक हो सकती है। ऐसे में जिले में इसके बेहतर इलाज की दरकार है।
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55 साल पहले देखा सपना, 12 साल से चल रहा था प्रयास
प्रो. सरोज चूड़ामणि का कहना है कि बीएचयू में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी पर काम करने का सपना वर्ष 1968 यानी 55 वर्ष पहले ही देखा था। अब शोध के माध्यम से पूरा करने में लगी हूं। जन्मजात बच्चों में भी स्पाइनल कॉर्ड इंजरी समस्या पाई जाती है। बतौर पीडियाट्रिक सर्जन और केजीएमयू में साल 2008 से 2011 तक कुलपति के कार्यकाल के दौरान इस पर कुछ काम हुआ और सफलता भी मिली, लेकिन इसे आगे बढ़ाने का मिशन पूरा करने के लिए बीएचयू में प्रयास चल रहा था। इस बीमारी के लिए जरूरी अत्याधुनिक लैब सहित अन्य उपकरण न होने से शोध नहीं हो सका। इसी उद्देश्य से आईआईटी कानपुर को चुना है। यहां करीब तीन साल तक शोध कार्य करना है।
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प्रो सरोज चूड़ामणि की उपलब्धियां

  • 1966: एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा से एमबीबीएस।
  • 1969: एसएन मेडिकल कॉलेज में एमएस जनरल सर्जरी करने वाली पहली महिला।
  • 1973: एम्स नई दिल्ली में एमसीएच पीडियाट्रिक सर्जरी
  • 1973-2007: आईएमएस बीएचयू में बतौर प्रवक्ता कार्यभार संभाला।
  • मार्च 2008 से मार्च 2011: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ की पहली महिला कुलपति बनीं
  • 2011 से बीएचयू में इमेरिटस प्रोफेसर।
  • 2014 से बीएचयू में सम्मानित प्रोफेसर।
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