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सज्जनता और सौम्यता के रास्ते पर ले जाती है दिल से मांगी क्षमा
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क्षमा पर्व का पावन दिन है, भव्य भावना का त्योहार। विगत वर्ष की सारी भूलें, देना हमारी आप बिसार।। दिल से मांगी गई क्षमा हमें सज्जनता और सौम्यता के रास्ते पर ले जाती है। आइए इस क्षमा पर्व पर हम अपने मन में क्षमा भाव का दीपक जलाएं उसे कभी बुझने न दें ताकि क्षमा का मार्ग अपनाते हुए धर्म के रास्ते पर चल सकें। आत्मशुद्धि के पावन पर्व के दिन जैन धर्मावलंबियों ने दशलक्षण महापर्व के समापन पर इसी संकल्प के साथ एक दूसरे से क्षमा मांगी।
कोरोना संक्रमण के कारण सार्वजनिक आयोजन निरस्त रहे। बृहस्पतिवार को कोरोना संक्रमण के कारण क्षमावाणी महापर्व पर ऑनलाइन क्षमा मांगी गई। फोन, मोबाइल संदेश और वीडियो कॉलिंग के जरिए वर्ष भर की गई गलतियों के लिए एक दूसरे से क्षमा मांगी। जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ की जन्मस्थली स्थित भदैनी जी दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र में क्षमावाणी पर्व मनाया गया। प्रात 8 बजे भगवान का 108 कलशों से जलाभिषेक हुआ। इसके बाद वृहद शांतिधारा और विशेष पूजन संपन्न हुआ। जैन धर्मावलंबियों ने पूरे विश्व से कोरोना के खात्मे की कामना की। शाम को भगवान के चरणों का अभिषेक पूजन केबाद आरती उतारी गई। इस सुरेंद्र कुमार जैन, आनंद जी जैन, सुनील, संजय, आकाश जैन, सुमित जैन, बीके जैन, आरती, मंजुला, मनोरमा, लता, बीना आदि मौजूद रहीं।
कश्मीर में बने अहिंसा स्थली
श्री दिगंबर जैन महासमिति के महामंत्री राकेश जैन ने बताया कि कोरोना के कारण सामूहिक रूप से क्षमा पर्व नहीं मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जैन समाज का प्रतिनिधिमंडल जम्मू कश्मीर में अहिंसा स्थली बनाने केलिए जल्द ही कश्मीर के राज्यपाल मनोज सिन्हा से भेंट करेगा। कहा कि अगर केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में अहिंसा स्थली बनाती है तो पूरे विश्व को सकारात्मक संदेश जाएगा।
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विजयी को मिलता है हारने वाले के पैर छूने का अधिकार
दिगंबर जैन समाज के राजेश जैन ने बताया कि क्षमावाणी पर्व अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। पिछले साल के आयोजन की यादें आज भी जेहन में ताजा हैं। सभी पुरुष एकत्र होकर क्षमावाणी की तैयारी करते थे। अपने-अपने कुर्ते उतारकर बैठ जाते और अपने-अपने लक्ष्य को पहले से देखकर मन ही मन तय कर लेते कि किसको किससे भिड़ना है। जैसे ही संकेत होता, लोग उठकर एक दूसरे से भिड़ जाते। उस समय अगर कोई बाहरी व्यक्ति देखे तो घबरा जाए कि यह क्या हो रहा है। सभी संभ्रांत लोग आपस में इतनी जोर शोर से क्यों लड़ रहे हैं लेकिन थोड़ी देर में सारा माजरा समझ में आ जाता है। इस कुश्ती में एक दूसरे के पैरों पर गिरने की आजमाइश होती है। जो इसमें विजयी होता है उसे हारने वाले के पैर छूने का अधिकार मिलता है। यहां बड़े छोटे का कोई भेद नहीं होता है। बस जो जीता वही विनयी। वही क्षमावान।
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कोरोना संक्रमण के कारण सार्वजनिक आयोजन निरस्त रहे। बृहस्पतिवार को कोरोना संक्रमण के कारण क्षमावाणी महापर्व पर ऑनलाइन क्षमा मांगी गई। फोन, मोबाइल संदेश और वीडियो कॉलिंग के जरिए वर्ष भर की गई गलतियों के लिए एक दूसरे से क्षमा मांगी। जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ की जन्मस्थली स्थित भदैनी जी दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र में क्षमावाणी पर्व मनाया गया। प्रात 8 बजे भगवान का 108 कलशों से जलाभिषेक हुआ। इसके बाद वृहद शांतिधारा और विशेष पूजन संपन्न हुआ। जैन धर्मावलंबियों ने पूरे विश्व से कोरोना के खात्मे की कामना की। शाम को भगवान के चरणों का अभिषेक पूजन केबाद आरती उतारी गई। इस सुरेंद्र कुमार जैन, आनंद जी जैन, सुनील, संजय, आकाश जैन, सुमित जैन, बीके जैन, आरती, मंजुला, मनोरमा, लता, बीना आदि मौजूद रहीं।
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कश्मीर में बने अहिंसा स्थली
श्री दिगंबर जैन महासमिति के महामंत्री राकेश जैन ने बताया कि कोरोना के कारण सामूहिक रूप से क्षमा पर्व नहीं मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जैन समाज का प्रतिनिधिमंडल जम्मू कश्मीर में अहिंसा स्थली बनाने केलिए जल्द ही कश्मीर के राज्यपाल मनोज सिन्हा से भेंट करेगा। कहा कि अगर केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में अहिंसा स्थली बनाती है तो पूरे विश्व को सकारात्मक संदेश जाएगा।
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विजयी को मिलता है हारने वाले के पैर छूने का अधिकार
दिगंबर जैन समाज के राजेश जैन ने बताया कि क्षमावाणी पर्व अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। पिछले साल के आयोजन की यादें आज भी जेहन में ताजा हैं। सभी पुरुष एकत्र होकर क्षमावाणी की तैयारी करते थे। अपने-अपने कुर्ते उतारकर बैठ जाते और अपने-अपने लक्ष्य को पहले से देखकर मन ही मन तय कर लेते कि किसको किससे भिड़ना है। जैसे ही संकेत होता, लोग उठकर एक दूसरे से भिड़ जाते। उस समय अगर कोई बाहरी व्यक्ति देखे तो घबरा जाए कि यह क्या हो रहा है। सभी संभ्रांत लोग आपस में इतनी जोर शोर से क्यों लड़ रहे हैं लेकिन थोड़ी देर में सारा माजरा समझ में आ जाता है। इस कुश्ती में एक दूसरे के पैरों पर गिरने की आजमाइश होती है। जो इसमें विजयी होता है उसे हारने वाले के पैर छूने का अधिकार मिलता है। यहां बड़े छोटे का कोई भेद नहीं होता है। बस जो जीता वही विनयी। वही क्षमावान।