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गरज-गरज सखि बादर बरसे पिया घर नाहीं मोर...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 11 Jul 2016 01:45 AM IST
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उप शास्त्रीय गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी
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वर्षाऋतु के रागों की मूल परंपरा लोक गीतों में ही समाहित दिखती है। लोक मानस के भाव ही शास्त्रक्त रागों में निबद्ध होकर मेघ मल्हार, सारंग और पीलू बन जाते हैं। इन रागों में मोर, पपीहों के स्वरों का विरह और बादलों का शोर होता है। वैसे भी सप्तक के स्वर सात जीव-जंतुओं की बोली से ही लिए गए हैं। शास्त्रीय रागों का मल्हार है तो लोक भावना का भी मल्हार है। मल्हार प्रेम की हूक है, चितवन है और मन के भीतर उठने वाली प्रियतम से मिलन की पीर भी है। वर्षा ऋतु में लोक का मल्हार चौमासा से लेकर बारहमासा तक व्यक्त किया गया है। ऐसे में दिलों में झूमते और वियोग भरते मल्हार को समझने की जरूरत है।
धरती का सीना चीर कर जब बीज अंकुरित होने लगें। कोपलों में पत्तियां फूट जाएं। गांव की महिलाएं खेतों में पंक्तिबद्ध होकर धान की रोपाई में जुट जाएं तब लोक जीवन में बरबस मल्हार आ जाता है। बादलों की बूंदें जब तक धरती को सींचकर तृप्त नहीं कर देंती, तबतक नई फसल उगाने का वातावरण नहीं बन पाता। इसीलिए गांवों में पुरुष और महिलाएं दोनों वर्षाऋतु में मल्हार गाते हैं। यह कहना है उप शास्त्रीय गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी का।
मल्हार वर्षाऋतु का गीत है। वर्षाकाल के रागों की मूल परंपरा लोक गीतों में ही दिखती है। कई बार सूखा पड़ जाता है। आखिर जब बादलों को रिझाने के गीत जब नहीं गाए जाएंगे तो काहे नहीं पड़ेगा सूखा। मंदिरों में जिस तरह मंत्रोच्चार से भगवान प्रसन्न होते हैं उसी तरह कजरी गाने से इंद्रदेव खुश होते हैं। लोग अब भी बारिश नहीं होने पर काल-कलौटी का टोटका करते हैँ। समूहबद्ध होकर युवक-युवतियां कारे मेघा पानी दे... की रट लगता हैं। विरहिनियां यानी वह स्त्रियां जिनके पिया परदेश होते हैं, वह बारहमासा, चौमासा गाती हैं। पहिला मास अषाढ़ /बरखा भई है अपार/ गोदी मोरे नाहिं बाल/ केकर करूं इंतजार....जैसे गीत गाने लगती हैं। गांव में स्त्रियों के चार महीने प्रतीक्षा में बीतते हैं। लेकिन जब आषाढ़ चढ़ता है और बादल घुमड़ने लगते हैं तो वह उन बादलों में ही प्रियतम के आने का एहसास करने लगती हैं। वैसे भी वर्षा खुशी का आधार रही है। पानी नहीं बरसे तो क्या हाल हो। गीत तो प्रकृित से जुड़ा है।
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जिसके प्रियतम दूर होंगे, वह विरह में खुशी का गीत कैसे गा सकता है। बादलों का शोर सुनकर चातक, मोर, पपीहा भी विरह वेदना व्यक्त व्यक्त करने लगते हैं। इस मौसम में नायक अपनी नायिका को तो नायिका अपने नायक को याद करती है। बारिश की बूंदों का धरती से मिलना ही मल्हार है। हर स्त्री की अरज रही है इसी वर्षा की बूंदों की तरह मेरा प्रियतम भी परदेस से आकर मुझसे मिले। फिर वह बंदिश पर आलाप लेती हैं- बादरवा बरसन को आए..। गरज-गरज सखि बादर बरसे...। दूसरी बंदिश में विरह की पीड़ा को वह इस तरह व्यक्त करती हैं-आओ पिया मत जाओ रतिया...। एक तो रात अंधियरिया..दूजे पिया परदेस/ हे मां कारी बदरिया बरसे...। वह कहती हैं कि सावन में लड़कियां मायके आती हैं। वर्ष में एक बार अपने भाई, भौजाई और सहेलियों से मिलने के लिए। इसका खामियाजा होता है कि प्रियतम से अलग हो जाती हैँ। इसी बिछुड़न ने मल्हार के रूप में विरह को जन्म दिया है। वैसे भी काले -काले मेघ आसमान में छाए हों तो मन हूक उठेगी ही। ऐसे माहौल में कवि कविता लिखने लगता है। गीतकार गुनगुनाने लगता है। कजरी महिलाएं इसलिए गाने लगती हैं कि इंद्र प्रसन्न हो जाएंगे घटाएं छा जाएंगी। बादल बरसने लगेंगे।
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धरती का सीना चीर कर जब बीज अंकुरित होने लगें। कोपलों में पत्तियां फूट जाएं। गांव की महिलाएं खेतों में पंक्तिबद्ध होकर धान की रोपाई में जुट जाएं तब लोक जीवन में बरबस मल्हार आ जाता है। बादलों की बूंदें जब तक धरती को सींचकर तृप्त नहीं कर देंती, तबतक नई फसल उगाने का वातावरण नहीं बन पाता। इसीलिए गांवों में पुरुष और महिलाएं दोनों वर्षाऋतु में मल्हार गाते हैं। यह कहना है उप शास्त्रीय गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी का।
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मल्हार वर्षाऋतु का गीत है। वर्षाकाल के रागों की मूल परंपरा लोक गीतों में ही दिखती है। कई बार सूखा पड़ जाता है। आखिर जब बादलों को रिझाने के गीत जब नहीं गाए जाएंगे तो काहे नहीं पड़ेगा सूखा। मंदिरों में जिस तरह मंत्रोच्चार से भगवान प्रसन्न होते हैं उसी तरह कजरी गाने से इंद्रदेव खुश होते हैं। लोग अब भी बारिश नहीं होने पर काल-कलौटी का टोटका करते हैँ। समूहबद्ध होकर युवक-युवतियां कारे मेघा पानी दे... की रट लगता हैं। विरहिनियां यानी वह स्त्रियां जिनके पिया परदेश होते हैं, वह बारहमासा, चौमासा गाती हैं। पहिला मास अषाढ़ /बरखा भई है अपार/ गोदी मोरे नाहिं बाल/ केकर करूं इंतजार....जैसे गीत गाने लगती हैं। गांव में स्त्रियों के चार महीने प्रतीक्षा में बीतते हैं। लेकिन जब आषाढ़ चढ़ता है और बादल घुमड़ने लगते हैं तो वह उन बादलों में ही प्रियतम के आने का एहसास करने लगती हैं। वैसे भी वर्षा खुशी का आधार रही है। पानी नहीं बरसे तो क्या हाल हो। गीत तो प्रकृित से जुड़ा है।
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जिसके प्रियतम दूर होंगे, वह विरह में खुशी का गीत कैसे गा सकता है। बादलों का शोर सुनकर चातक, मोर, पपीहा भी विरह वेदना व्यक्त व्यक्त करने लगते हैं। इस मौसम में नायक अपनी नायिका को तो नायिका अपने नायक को याद करती है। बारिश की बूंदों का धरती से मिलना ही मल्हार है। हर स्त्री की अरज रही है इसी वर्षा की बूंदों की तरह मेरा प्रियतम भी परदेस से आकर मुझसे मिले। फिर वह बंदिश पर आलाप लेती हैं- बादरवा बरसन को आए..। गरज-गरज सखि बादर बरसे...। दूसरी बंदिश में विरह की पीड़ा को वह इस तरह व्यक्त करती हैं-आओ पिया मत जाओ रतिया...। एक तो रात अंधियरिया..दूजे पिया परदेस/ हे मां कारी बदरिया बरसे...। वह कहती हैं कि सावन में लड़कियां मायके आती हैं। वर्ष में एक बार अपने भाई, भौजाई और सहेलियों से मिलने के लिए। इसका खामियाजा होता है कि प्रियतम से अलग हो जाती हैँ। इसी बिछुड़न ने मल्हार के रूप में विरह को जन्म दिया है। वैसे भी काले -काले मेघ आसमान में छाए हों तो मन हूक उठेगी ही। ऐसे माहौल में कवि कविता लिखने लगता है। गीतकार गुनगुनाने लगता है। कजरी महिलाएं इसलिए गाने लगती हैं कि इंद्र प्रसन्न हो जाएंगे घटाएं छा जाएंगी। बादल बरसने लगेंगे।