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चार किलोमीटर लंबी शोभायात्रा: राजसी वेश में डोले पर विराजे काशी के कोतवाल; हर-हर महादेव से गूंजी काशी

Tue, 05 Dec 2023 09:48 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Tue, 05 Dec 2023 09:48 AM IST
सार

महंत राजेश्वरानंद ने बताया कि बाबा काल भैरव कलयुग के प्रत्यक्ष देवता हैं। भैरव अष्टमी के दिन बाबा का दर्शन-पूजन करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। भक्तों की मनवांछित कामना पूरी होती है।

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Varanasi: Four kilometer long procession, Kotwal of Kashi seated on a palanquin in royal attire.
राजसी वेश में डोले पर विराजे काशी के कोतवाल - फोटो : संवाद

विस्तार

डोले पर सवार होकर बाबा काशी का जायजा लेने निकले। चार किलोमीटर की दूरी को तय करने में छह घंटे से अधिक का समय लग गया। काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव सोमवार को जब राजशी वेशभूषा धारण कर शहर का जायजा लेने निकले तो मानो पूरी काशी हर-हर महादेव के जय घोष से गूंज उठी। बाबा काल भैरव के तीन दिवसीय जन्मोत्सव के आयोजन के तहत बाबा की भव्य डोला यात्रा निकाली गई।

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शोभायात्रा में हाथी, घोड़ा, ऊंट, बैल, लाग विमान, काली प्रतिमा, औघड़ स्वरूप भूत-प्रेतों की टोली, पंचदेवता स्वरूप अष्ट भैरव झांकी, निशान ध्वज शामिल था। किन्नर, भूत-प्रेत, औघड़, साधु- संतों ने शोभायात्रा की अगुवाई की। बाबा काल भैरव की शोभायात्रा पियरी स्थित कालभैरव मंदिर से प्रारंभ होकर अपने पारंपरिक मार्ग पियरी त्रिमुहानी, जालपा देवी, काशीपुर, कर्णघंटा, बुलानाला, गोलघर, भैरवनाथ मंदिर, महामृत्युंजय महादेव, मैदागिन, कबीरचौरा होते हुए काल भैरव मंदिर पियरी आकर समाप्त हुई। महंत राजेश्वरानंद सरस्वती ने बताया कि मंगलवार पांच दिसंबर को अष्ट भैरव पूजन किया जाएगा। मंगलवार को ही जन्मोत्सव महाआरती मध्य रात्रि 12 बजे होगी। छह दिसंबर को भक्तों में प्रसाद वितरित और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा। सभी आयोजन बड़ी पियरी चौखंडी वीर स्थित बाबा श्रीकालभैरव के मंदिर से किया जाएगा।

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भैरव अष्टमी पर बाबा के दर्शन से नष्ट होते हैं पाप

महंत राजेश्वरानंद ने बताया कि बाबा काल भैरव कलयुग के प्रत्यक्ष देवता हैं। भैरव अष्टमी के दिन बाबा का दर्शन-पूजन करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। भक्तों की मनवांछित कामना पूरी होती है।

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Varanasi: Four kilometer long procession, Kotwal of Kashi seated on a palanquin in royal attire.
काशी के कोतवाल बाबा कालभैरव - फोटो : अमर उजाला

अंग्रेजों के दिये लाट भैरव नाम से प्रसिद्ध

बाबा के लाट भैरव नाम का भी इतिहास है। कई भक्तों को यह संशय होता है कि कपाल भैरव और लाट भैरव दोनों अलग-अलग देवता हैं। जबकि कपाल भैरव बाबा श्री लाट भैरव का ही पौराणिक नाम है। लाट भैरव शब्द अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों द्वारा दिया गया। काशी में इसी नाम से बाबा अधिक विख्यात हैं। शास्त्रों के अनुसार भैरवनाथ को ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति काशी के गंगा और वरुणा नदी के संगम स्थल वर्तमान समय में कज्जाकपुरा नाम से विख्यात इसी स्थान पर मिली थीं। तीनों लोकों में भटकने के बाद काशी में प्रवेश करते ही ब्रह्मा का कटा हुआ पांचवा (कपाल) मुंड बाबा भैरवनाथ के हाथों से छूटकर चिंघाड़ मारते हुए धरती पर उतरा। तब से इस पावन स्थल को तीर्थ के रूप में श्री कपाल मोचन कुंड के नाम से जाना जाता हैं। कुंड के जल में स्नान करने से ब्रह्म दोष, चर्म रोग व बांझपन आदि से मुक्ति मिलती हैं।

लिंग रूप में प्रथम भैरव

शिवम अग्रहरि ने बताया कि बाबा कपाल भैरव प्रसिद्ध लाट भैरव का दर्शन विशाल लिंगाकार स्वरूप में होता है। अन्य सभी भैरव मूर्त रूप या पिंड रूप में दर्शनीय हैं, किंतु बाबा लाट भैरव लिंग रूप में प्रथम भैरव हैं। इस कारण इन्हें कपालेश्वर महादेव के रूप में भी पूजा जाता हैं।

 

Varanasi: Four kilometer long procession, Kotwal of Kashi seated on a palanquin in royal attire.
काशी के कोतवाल का दरबार - फोटो : अमर उजाला

काशी के न्यायाधीश है कपाल भैरव, अष्ट भैरव की कचहरी

आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित भैरवाष्टकं के श्लोकानुसार काशीवास लोक पुण्य पाप शोधकं विभूम यानी बाबा कपाल भैरव काशी में वास करने वाले लोगों के पाप और पुण्य कर्मों का शोधन करने वाले देवता हैं। इसका प्रमाण मंदिर के गर्भगृह में विद्यमान अष्ट भैरव के चौकियों से प्रत्यक्ष तौर पर मिलता है। कहा जाता है कि इन आठ चौकियों पर काशी के आठों दिशाओं (चारों दिशा और चार कोण) के रक्षक अष्ट प्रधान भैरव बाबा के समक्ष अपने क्षेत्रों की समस्त शुभाशुभ कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। न्यायाधीश की भूमिका में बाबा श्री कपाल भैरव कर्मानुसार काशीवासियों के सद्कर्मों के पुण्य फल तथा पापकर्मों के निमित्त दंड का विधान तय करते हैं।

हर दिन लगता है अलग भोग

भैरव उपासना के अनुसार रविवार को पायसान अथवा खीर, सोमवार को खोवे का लड्डू, मंगलवार को शुद्ध घृत में गेहूं के आटे व गुड़ से निर्मित हलुआ, बुधवार को उड़द के दाल का बारा अलोना (बिना नमक), गुरुवार को ठोकवा या लड्डू, शुक्रवार को हलुआ घुघरी, शनिवार को उड़द दाल, चना दाल मूंग दाल व चावल से निर्मित खिचड़ी का भोग अर्पित करने से भैरव शीघ्र प्रसन्न होतें हैं तथा भक्तों के मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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