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उस्ताद के दिल में थी गंगा, मजहब था संगीत
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 22 Aug 2016 02:12 AM IST
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शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बनारस के थे और बनारस उनका। उनके दिल में गंगा थी और संगीत उनका मजहब। गंगा किनारे बालाजी मंदिर में रियाज करने की उनकी धुन इस बात की गवाह है। बनारसीपन उनके लिए सबसे मूल्यवान था इसीलिए वह जीवन भर मस्ती के सुर में रहे और हर किसी को मस्त किया। उन्हें शगुन के साज शहनाई को बुलंदी पर पहुंचाने की खुशी थी तो इसे शैक्षिक मान्यता न मिल पाने का मलाल भी सालता रहा। वह चाहते थे कि शहनाई को संगीत के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। उनकी यादों को बरकरार रखने के लिए शहनाई को शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। यह कहना है कि गोरखपुर विश्वविद्यालय के संगीत विभागाध्यक्ष रहे डॉ. राजेश्वर आचार्य का।
उस्ताद की पुण्यतिथि पर डॉ. आचार्य ने उनसे जुड़ी यादें ‘अमर उजाला’ से साझा कीं। बताया, उनके मिजाज में बनारस झलकता था। उनको जीवन भर मलाल रहा कि प्राइमरी स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक शहनाई को शैक्षिक पाठ्यक्रम के रूप में मान्यता नहीं मिली। बिहार के डुमरांव निवासी उस्ताद कला-संगीत की राजधानी बनारस में रमे तो रम ही गए। ठुमरी गायिका पद्मश्री सोमा घोष बताती हैं कि बनारस की संगीत परंपरा में एक ही मजहब को लोग मानते हैं। उस्ताद भी ऐसे ही संगीतकार थे जिन्होंने संगीत को ही अपना मजहब माना। वह बनारस घराने की खास चीजों के माहिर थे। वह जब बनारसी ठुमरी, दादरा, चैती बजाते थे, तब महफिल झूम जाया करती थी।
उस्ताद के पुत्र शहनाई वादक उस्ताद जामिन हुसैन बताते हैं कि अब्बा की बंदिशों की फरमाइश आज भी हर महफिल में होती है। वह ठुमरी, दादरा और कजरी जब बजाते थे, तब उनकी शहनाई से निकलने वाली धुनों की कशिश से लोगों की थकान दूर हो जाती थी। शहनाई को ताउम्र उन्होंने सिरहाने रखा और गंगा उनके दिल में थी। गंगा से उनका इस कदर प्रेम था कि घाट किनारे बालाजी मंदिर के नौबतखाने में वह रियाज करना नहीं भूलते थे।
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उस्ताद की पुण्यतिथि पर डॉ. आचार्य ने उनसे जुड़ी यादें ‘अमर उजाला’ से साझा कीं। बताया, उनके मिजाज में बनारस झलकता था। उनको जीवन भर मलाल रहा कि प्राइमरी स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक शहनाई को शैक्षिक पाठ्यक्रम के रूप में मान्यता नहीं मिली। बिहार के डुमरांव निवासी उस्ताद कला-संगीत की राजधानी बनारस में रमे तो रम ही गए। ठुमरी गायिका पद्मश्री सोमा घोष बताती हैं कि बनारस की संगीत परंपरा में एक ही मजहब को लोग मानते हैं। उस्ताद भी ऐसे ही संगीतकार थे जिन्होंने संगीत को ही अपना मजहब माना। वह बनारस घराने की खास चीजों के माहिर थे। वह जब बनारसी ठुमरी, दादरा, चैती बजाते थे, तब महफिल झूम जाया करती थी।
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उस्ताद के पुत्र शहनाई वादक उस्ताद जामिन हुसैन बताते हैं कि अब्बा की बंदिशों की फरमाइश आज भी हर महफिल में होती है। वह ठुमरी, दादरा और कजरी जब बजाते थे, तब उनकी शहनाई से निकलने वाली धुनों की कशिश से लोगों की थकान दूर हो जाती थी। शहनाई को ताउम्र उन्होंने सिरहाने रखा और गंगा उनके दिल में थी। गंगा से उनका इस कदर प्रेम था कि घाट किनारे बालाजी मंदिर के नौबतखाने में वह रियाज करना नहीं भूलते थे।
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