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अनोखे गणपति: काशी की सतह से दो इंच ऊपर हैं यक्ष विनायक, पिता शिव के लिए ली थी प्रतिज्ञा; जानें खासियत

Sat, 30 Aug 2025 10:11 AM IST
अमन विश्वकर्मा प्रशांत शर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
प्रशांत शर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 30 Aug 2025 10:11 AM IST
सार

काशी में विश्वनाथ मंदिर की गली में एक स्थान पर विराजमान पंचमुखी भगवान गणेश के दर्शन-पूजन का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, गणपति ने अपने पिता शिव के लिए खास प्रतिज्ञा ली थी।

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Unique Ganpati Yaksha Vinayak is two inches above surface of Kashi taken vow for father Shiva
गणपति मंदिर में महंत रवि शास्त्री। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: शिव की नगरी काशी में भगवान गणेश दो रूपों में पूजे जाते हैं- विनायक और हेरम्ब गणपति। हिंदू देवता गणेश का यह प्रतीकात्मक रूप है, जो सभी शक्तियों का अवतार माना जाता है। आस्था की नगरी काशी में वैसे तो अनेक चमत्कारी मंदिर हैं, लेकिन उनमें से एक है पंचमुखी यक्ष विनायक मंदिर, जो विश्वनाथ गली में स्थित है। 

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इस मंदिर की विशेषता यह है कि गणपति काशी में होते हुए भी काशी की धरती पर विराजमान नहीं हैं। इसके पीछे राजा दिवोदास की एक पौराणिक कथा है। 

कहा जाता है कि शिवजी माता पार्वती के आग्रह पर अपने परिवार सहित कैलाश से काशी (आनंदवन) आकर बस गए। लेकिन उस समय काशी के राजा दिवोदास को देवताओं का आगमन अच्छा नहीं लगा। उन्होंने तपस्या कर ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि देवता देवलोक में ही रहें, क्योंकि पृथ्वी तो मनुष्यों के लिए है।

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खास है आध्यात्मिक महत्व

ब्रह्माजी के कहने पर शिवजी काशी छोड़कर मंदराचल पर्वत चले गए, लेकिन काशी नगरी के प्रति उनका मोह समाप्त नहीं हुआ। गणेशजी को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे क्रोधित हो गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की और पंचमुखी रूप में प्रकट होकर काशी की भूमि से अपना पैर हटा लिया तथा आकाश में विराजमान हो गए।

यह देखकर भगवान विष्णु और राजा दिवोदास ब्राह्मण रूप धारण कर गणेशजी को मनाने पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने राजा को तपोवन जाने का आदेश दिया। उसके बाद शिवजी ने पुनः काशी में स्थायी निवास किया और विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से यह मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले पंचमुखी यक्ष विनायक का दर्शन करना आवश्यक है, तभी काशी यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

मंदिर के महंत रवि शास्त्री ने बताया कि उनकी पांचवीं पीढ़ी इस चमत्कारी गणपति की सेवा कर रही है। काशी खंड और गणेश पुराण में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। 56 विनायकों में यह 44वां विनायक है। महंत के अनुसार, पंचमुखी यक्ष विनायक के दर्शन मात्र से सभी 56 विनायकों के दर्शन का फल प्राप्त होता है। भक्त यदि गणेशजी को 108 दूब चढ़ाते हैं, तो उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

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