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उम्मीद की मशाल: बेटे के सपने को साकार कर रहे पिता, भविष्य निधि के पैसे से तैयार की हॉकी की नर्सरी

Mon, 30 May 2022 06:09 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Mon, 30 May 2022 06:09 PM IST
सार

खेल का जुनून ऐसा की 81 साल के उम्र में भी अपने भविष्य निधि की पूंजी से सैकड़ों हॉकी खिलाड़ियों का भविष्य संवार रहे हैं पूर्व शिक्षक गौरी शंकर सिंह। बेटे के सपने को साकार करने के लिए उन्होंने निशुल्क हॉकी की एकेडमी खोली। 

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Umeed Ki Mashal : Father making son's dream come true, hockey nursery prepared with provident fund money
गौरी शंकर सिंह संवार रहे सैकड़ों खिलाड़ियों का भविष्य - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खेल का जुनून ऐसा की 81 साल के उम्र में भी अपने भविष्य निधि की पूंजी से सैकड़ों हॉकी खिलाड़ियों का भविष्य संवार रहे हैं पूर्व शिक्षक गौरी शंकर सिंह। बेटे के सपने को साकार करने के लिए उन्होंने निशुल्क हॉकी की एकेडमी खोली और अब तक सैकड़ों खिलाड़ियों की नर्सरी वह तैयार कर चुके हैं। अपनी इसी कोशिश से वह उम्मीद की मशाल बन गए हैं।

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गौरी शंकर के ओलंपियन बेटे विवेक सिंह ने गरीब बच्चों की प्रतिभा निखारने का सपना देखा था जिसे पूरा होने से पहले ही उनकी कैंसर से मौत हो गई। बेटे के 33 वर्ष की आयु में निधन होने के बाद भी पिता का हौसला नहीं टूटा। बेटे की स्मृति को हमेशा जिंदा रखने के उद्देश्य से पिता ने हरहुआ में बेटे के नाम से हॉकी एकेडमी का निर्माण कराया।
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सात साल से हॉकी खिलाड़ियों की प्रतिभा निखार रहे हैं। वर्तमान में एकेडमी में तैयार खिलाड़ी यूपी टीम में ही नहीं अखिल भारतीय हॉकी प्रतियोगिता में अपनी चमक बिखेर रहे हैं। गौरी शंकर बताते हैं कि नौकरी के दौरान उन्होंने 1971 से यूपी कॉलेज में बच्चों को हॉकी का प्रशिक्षण देने का कार्य शुरू किया। इनसे प्रशिक्षित युवाओं में आज 20 अंतरराष्ट्रीय और 100 से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं।

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इससे पहले गौरी शंकर खुद अपने कॉलेज के दिनों में फुटबाल, बैडमिंटन और हॉकी विश्वविद्यालय स्तर पर खेला। यूपी कॉलेज में जीव विज्ञान के प्रवक्ता रहे गौरी शंकर सिंह 2001 में सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद उन्होंने पीएफ की राशि (12.5 लाख) से हरहुआ के पास करोमा में छह बीघा जमीन में खेल मैदान तैयार कराया। जहां वर्तमान में 70 बच्चे हॉकी के गुर सीखते हैं।

सभी बच्चे हैं खिलाड़ी

मास्टर गौरी शंकर और उनकी पत्नी पद्मा सिंह (राष्ट्रीय स्तर की एथलीट) ने अपने बच्चों से पूछा कि आगे क्या करना है? सभी ने जवाब दिया खेलना है। दो बेटे स्वर्गीय विवेक सिंह और राहुल सिंह हॉकी में ओलंपिक तक पहुंचे। प्रशांत सिंह ने हॉकी में व राजन सिंह ने बैडमिंटन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौशल दिखाया। अनन्य सिंह ने राष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन में और सीमांत सिंह ने रणजी ट्रॉफी में नाम कमाया।

डेढ़ सौ बच्चे सीख रहे हॉकी के गुर

यहां करीब 150 बच्चे आज हॉकी के गुर सीखते हैं। वह प्रतिदिन 20 किलोमीटर दूरी तय कर खेल मैदान पर जाते हैं। खास यह कि इसके लिए सरकारी मदद नहीं ली। खेल में योगदान को लेकर 2011 में इनके ऊपर ‘एंड वी प्ले ऑन’ नाम से बनी गैर फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
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