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उलूक महोत्सवः ‘...जो बाबा पहन कर भागे थे वो सलवार किसका था’, ऐसी कविताएं सुन दर्शक हुए लोटपोट
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Sat, 04 Nov 2017 11:26 PM IST
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उलूक महोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
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‘इसी उलझन में अक्सर रात को करवट बदलता हूं, जो बाबा पहन कर भागे थे वो सलवार किसका था...।’ कुशीनगर के राजेश राही ने यह कविता सुनाकर दर्शकों को लोटपोट कर दिया। शनिवार गोष्ठी की ओर से लक्सा स्थित मारवाड़ी युवक संघ में 17वां उलूक महोत्सव मनाया गया।
इस बार महोत्सव की थीम ‘बाबागीरी’ रही। सांड़ बनारसी ने सुनाया- ‘बहू बेटियों की आबरू तार-तार करें, ऐसे ढोंगी बाबा ही तो हुरपेट पाते हैं...।’ दादरी के अली हसन मकरेंडिया ने सुनाया कि ‘मंदिर व मस्जिद से निकलो, गिरजे और गुरुद्वारों से, करो देश की आज हिफाजत भीतर के गद्दारों से...।’
देवरिया के बादशाह प्रेमी ने सुनाया- ‘सुना है इश्क में गधे भी सूखी घास खाते हैं..।’ इलाहाबाद के अखिलेश द्विवेदी ने सुनाया कि ‘आईना तो बड़ा कर दिया आपने कद बड़ा कीजिए खुद निखर जाएंगे...।’
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लखनऊ की व्याख्या मिश्रा ने सुनाया- ‘मोहब्बत को निभाने में पसीने छूट जाते हैं।’ देवरिया के भूषण त्यागी ने सुनाया कि ‘दर्द होता रहा छटपटाते रहे, आईने से सदा चोट खाते रहे...।’ प्रतापगढ़ के दिनेश सिंह गुक्कज और मीरा तिवारी ने भी अपनी रचनाओं से महफिल लूटी।
इससे पहले नगाड़े की थाप पर रिक्शे पर सवार उलूकदेव का स्वागत कर महोत्सव स्थल तक पहुंचाया गया। अध्यक्षता आसाराम की घोषणा से की गई। इसके बाद अध्यक्ष जगदंबा तुलस्यान, सचिव सांड़ बनारसी, प्रवीण चतुर्वेदी आदि ने ढिबरी दिखाकर उलूकदेव की आरती उतारी।
विशिष्ट लोगों को पगड़ी पहनाई गई। सभी कवियों को अंगवस्त्रम, स्मृति चिह्न और झुनझुना देकर सम्मानित किया गया। अध्यक्षता न्यायाधिकरण के सदस्य अनिल चौधरी ने की। संचालन विजेंद्र मिश्र दमदार बनारसी ने किया।
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इस बार महोत्सव की थीम ‘बाबागीरी’ रही। सांड़ बनारसी ने सुनाया- ‘बहू बेटियों की आबरू तार-तार करें, ऐसे ढोंगी बाबा ही तो हुरपेट पाते हैं...।’ दादरी के अली हसन मकरेंडिया ने सुनाया कि ‘मंदिर व मस्जिद से निकलो, गिरजे और गुरुद्वारों से, करो देश की आज हिफाजत भीतर के गद्दारों से...।’
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देवरिया के बादशाह प्रेमी ने सुनाया- ‘सुना है इश्क में गधे भी सूखी घास खाते हैं..।’ इलाहाबाद के अखिलेश द्विवेदी ने सुनाया कि ‘आईना तो बड़ा कर दिया आपने कद बड़ा कीजिए खुद निखर जाएंगे...।’
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लखनऊ की व्याख्या मिश्रा ने सुनाया- ‘मोहब्बत को निभाने में पसीने छूट जाते हैं।’ देवरिया के भूषण त्यागी ने सुनाया कि ‘दर्द होता रहा छटपटाते रहे, आईने से सदा चोट खाते रहे...।’ प्रतापगढ़ के दिनेश सिंह गुक्कज और मीरा तिवारी ने भी अपनी रचनाओं से महफिल लूटी।
इससे पहले नगाड़े की थाप पर रिक्शे पर सवार उलूकदेव का स्वागत कर महोत्सव स्थल तक पहुंचाया गया। अध्यक्षता आसाराम की घोषणा से की गई। इसके बाद अध्यक्ष जगदंबा तुलस्यान, सचिव सांड़ बनारसी, प्रवीण चतुर्वेदी आदि ने ढिबरी दिखाकर उलूकदेव की आरती उतारी।
विशिष्ट लोगों को पगड़ी पहनाई गई। सभी कवियों को अंगवस्त्रम, स्मृति चिह्न और झुनझुना देकर सम्मानित किया गया। अध्यक्षता न्यायाधिकरण के सदस्य अनिल चौधरी ने की। संचालन विजेंद्र मिश्र दमदार बनारसी ने किया।