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रामनगर में जीवंत होगा त्रेता युग
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
Updated Wed, 14 Sep 2016 02:14 AM IST
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बिजली की चकाचौंध रोशनी, माइक और चमक-दमक वाले कपड़ों के बिना दुनिया की अपने तरह की अकेली रामनगर की रामलीला अनंत चतुर्दशी को यानी 15 सितंबर से शुरू होगी। यह देश की वह लीला है, जिसमें पांच सौ वर्ष पुरानी जीवन शैली, संस्कृति और परिवेश महीने भर के लिए जीवंत हो उठेगा। द्वारपालों के उद्घोष के बाद किले से निकलने वाली शाही सवारी की झलक पाने के लिए सड़कों के दोनों किनारों पर कतारबद्ध लीला प्रेमी हर हर महादेव के जयकारे लगाते दिखेंगे।
अयोध्या, चित्रकूट के संत लीला देखने के लिए पहुंच गए हैं। सुसज्जित हाथी पर सवार राजा के साथ शाही बग्घी, हाथी-घोड़ों की फौज पुरानी दुनिया का दर्शन कराएगी। एक दिन बाद शुरू होने वाली इस लीला का देश के संतों, भक्तों, सनातनधर्मियों को ही नहीं, विश्व भर के लीला प्रेमियों को शिद्दत से इंतजार है। इस लीला की नींव 1776 में महाराजा उदित नारायण सिंह ने रखी थी।
रामनगर की जग विख्यात रामलीला मेहताबी रोशनी में होती है। मशाल की रोशनी में रामायणी, राजा के सुसज्जित हाथी के पास ही मानस के प्रसंगों की चौपाइयों का ढोल, तासे पर सस्वर गायन करेंगे। लीला स्थल पर पंचलाइट जलेगी। इसके लिए प्रशिक्षित मशालची मशाल जलाने के लिए रहेंगे। भाला, तलवार काशी नरेश के शस्त्रागार से निकाला जाएगा। तोप भी दगेगी। धनुषयज्ञ, नक्कटैया जैसी लीलाओं के अवसर पर तोपची पारंपरिक राजशी पहनावे में तोप दागते नजर आएंगे।
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कहते हैं कि लीला में उमड़ने वाली हजारों की भीड़ की नजर वहां की चमक-दमक या पात्रों के अभिनय पर नहीं, बल्कि प्रभु दर्शन का भाव प्रगट होने और उसकी अनुभूति करने पर होती है। अस्सी के दीनानाथ शर्मा, गढ़वासी टोला के संतोष शर्मा कहते हैं कि महीने भर भगवान उस लीला के दौरान वहां वास करते हैं। आरती होती है तो लगता है कि साक्षात भगवान दर्शन दे रहे हैं और लीला देखने के लिए अपनी धुन में रमा समूह जयकारों के साथ निहाल हो उठता है।
कोई बाबा, परदादा के जमाने की पुरानी छड़ी लिए खड़ा मिलता है तो कोई कांख में छाता दबाए। सफेद धोती, किनारीदार साफा और आंखों में काजल लगाए दर्शक भी इस लीला की निधि से कम नहीं लगते। दोपहर बाद से ही लोग लीला के लिए सजने संवरने लगते हैं। रामबाग पोखरे से लेकर गंगा तटों तक लीला प्रेमी बनते-ठनते नजर आएंगे। भांग, बूटी छान कर मगही पान का बीड़ा जमा कर लाइट, छाता, पोथी और पीढ़ा लेकर लीला देखने के लिए लोग आज भी निकलते हैं और फिर कुछ देर के लिए रामनगर में एक नई दुनिया बस जाती है।
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अयोध्या, चित्रकूट के संत लीला देखने के लिए पहुंच गए हैं। सुसज्जित हाथी पर सवार राजा के साथ शाही बग्घी, हाथी-घोड़ों की फौज पुरानी दुनिया का दर्शन कराएगी। एक दिन बाद शुरू होने वाली इस लीला का देश के संतों, भक्तों, सनातनधर्मियों को ही नहीं, विश्व भर के लीला प्रेमियों को शिद्दत से इंतजार है। इस लीला की नींव 1776 में महाराजा उदित नारायण सिंह ने रखी थी।
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रामनगर की जग विख्यात रामलीला मेहताबी रोशनी में होती है। मशाल की रोशनी में रामायणी, राजा के सुसज्जित हाथी के पास ही मानस के प्रसंगों की चौपाइयों का ढोल, तासे पर सस्वर गायन करेंगे। लीला स्थल पर पंचलाइट जलेगी। इसके लिए प्रशिक्षित मशालची मशाल जलाने के लिए रहेंगे। भाला, तलवार काशी नरेश के शस्त्रागार से निकाला जाएगा। तोप भी दगेगी। धनुषयज्ञ, नक्कटैया जैसी लीलाओं के अवसर पर तोपची पारंपरिक राजशी पहनावे में तोप दागते नजर आएंगे।
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कहते हैं कि लीला में उमड़ने वाली हजारों की भीड़ की नजर वहां की चमक-दमक या पात्रों के अभिनय पर नहीं, बल्कि प्रभु दर्शन का भाव प्रगट होने और उसकी अनुभूति करने पर होती है। अस्सी के दीनानाथ शर्मा, गढ़वासी टोला के संतोष शर्मा कहते हैं कि महीने भर भगवान उस लीला के दौरान वहां वास करते हैं। आरती होती है तो लगता है कि साक्षात भगवान दर्शन दे रहे हैं और लीला देखने के लिए अपनी धुन में रमा समूह जयकारों के साथ निहाल हो उठता है।
कोई बाबा, परदादा के जमाने की पुरानी छड़ी लिए खड़ा मिलता है तो कोई कांख में छाता दबाए। सफेद धोती, किनारीदार साफा और आंखों में काजल लगाए दर्शक भी इस लीला की निधि से कम नहीं लगते। दोपहर बाद से ही लोग लीला के लिए सजने संवरने लगते हैं। रामबाग पोखरे से लेकर गंगा तटों तक लीला प्रेमी बनते-ठनते नजर आएंगे। भांग, बूटी छान कर मगही पान का बीड़ा जमा कर लाइट, छाता, पोथी और पीढ़ा लेकर लीला देखने के लिए लोग आज भी निकलते हैं और फिर कुछ देर के लिए रामनगर में एक नई दुनिया बस जाती है।