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काशी के गंगा घाटों से इस कारण गायब हो रहीं परंपरागत छतरियां  

Mon, 26 Mar 2018 02:40 PM IST
पूजा सिंह, अमर उजाला, वाराणसी
पूजा सिंह, अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 26 Mar 2018 02:40 PM IST
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Traditional umbrella disappearing from ganga ghat of varanasi
गंगा घाट पर लगी छतरी - फोटो : अमर उजाला
दुनिया में काशी की पहचान गंगा घाटों से है और घाटों को कलात्मक छतरियों से जाना जाता है। गंगा घाटों पर छतरियों के नीचे बैठकर चंदन घिसते और तिलक लगाते पंडे और पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु एक अलग तरह की छटा का अहसास दिलाते हैं।
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कभी दशाश्वमेध घाट और केदार घाट से तुलसी घाट तक गंगा-जमुनी तहजीब को बयां करने वाली छतरियां शोभायमान होती थीं लेकिन अब कुछ ही घाटों पर ये नजर आती हैं।

घाटों को चार चांद लगाने वाली बांस की इन छतरियों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए सात समंदर पार से विदेशी आते हैं। जल्दी ही ये छतरियां बीते दिन की बात हो जाएंगी।
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वजह, छतरियों को बनाने वाले अब मात्र तीन ही कारीगर बचे हैं। सभी एक ही परिवार के हैं और बुजुर्ग हो चले हैं। इनकी अगली पीढ़ी छतरियां बनाने का हुनर सीखने को तैयार नहीं है। 
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लोग छतरियां खरीद कर पंडों को दान में देते थे

Traditional umbrella disappearing from ganga ghat of varanasi
छतरी के नीचे बैठे साधु - फोटो : अमर उजाला
चार पीढ़ियों छतरी बनाने वाले घौसाबाद के 89 वर्षीय लालजी बताते हैं कि इस धंधे से अब दो वक्त की रोटी भी जुटाना मुश्किल है। परिवार के दूसरे सदस्य दूसरे कामों में लग गए हैं।

इन्हीं के छोटे भाई 85 साल के शंभू बताते हैं कि उनकी बनाई छतरियां विदेशी भी लेकर जाते थे। एक छतरी बनाने में आठ से दस दिन का समय लगता है और बदले में चार से पांच सौ रुपये मिलते हैं।

पहले लोग छतरियां खरीद कर घाटों पर पंडों को दान में देते थे लेकिन अब ये केवल आर्डर पर ही बनती हैं। सबसे छोटे 75 वर्षीय गोपाल कहते हैं-माना कि ये छतरियां काशी की पहचान हैं लेकिन ठीक कमाई न होने के कारण बच्चे इसे सीखना नहीं चाहते। फिर छतरियों का स्थान प्लास्टिक ने भी ले लिया है।
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