Varanasi News: काशी के तीन कलाकार विदेशों में सिखा रहे सुर, लय व ताल की बारीकियां; बुजुर्ग भी सीख रहे ठुमरी
Varanasi News: काशी के तीन कलाकार विदेशों में भारतीय संगीत की सुर, लय और ताल की बारीकियां सिखा रहे हैं। ठुमरी, शास्त्रीय गायन और वादन सीखने के लिए विदेशों में बच्चों से लेकर 80 वर्ष तक के बुजुर्गों में भी खास उत्साह दिख रहा है। काशी की सांगीतिक परंपरा विदेशी श्रोताओं और विद्यार्थियों के दिलों में खास जगह बना रही है।
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काशी का संगीत विदेशियों के दिलों में उतर रहा है। सुर, लय और ताल में लोग ऐसे बंधते जा रहे हैं कि उम्र की बंदिशें भी टूटती जा रही हैं। यही वजह है कि काशी से विदेशों में संगीत सिखाने गए कलाकारों से छह साल के बच्चों के अलावा 80 वर्ष तक के बुजुर्ग भी सीख रहे हैं। बनारस घराने के सधे कलाकार विदेशों में संगीत की आभा निखार रहे हैं।
विदेश मंत्रालय से संबद्ध भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) वैश्विक स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए कार्य करता है। सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए संगीत की विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण देने हेतु कलाकारों का चयन कर विभिन्न देशों में भेजा गया है। ये कलाकार स्वामी विवेकानंद कल्चर सेंटर के माध्यम से छह माह से लेकर करीब दो वर्ष तक प्रशिक्षण देते हैं।
बनारस घराने के तीन कलाकार विदेशों में प्रशिक्षण दे रहे हैं, जबकि दो कलाकार कुछ माह प्रशिक्षण देकर लौट चुके हैं। प्रख्यात ठुमरी सम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी के शिष्य पं. राहुल मिश्र पेरिस में, बनारस घराने के पं. राजेश्वर प्रसाद मिश्र के शिष्य पं. आशीष मिश्र दक्षिण अमेरिका के गुयाना में गायन और अभिजीत चक्रवर्ती फिजी में कथक सिखा रहे हैं।
पं. राहुल ने बताया कि वहां के लोगों में शास्त्रीय संगीत सीखने की काफी दिलचस्पी है। वे प्रतिदिन दो-दो घंटे प्रशिक्षण देते हैं। सीखने वालों में पांच साल के बच्चे से लेकर 60 साल तक के लोग शामिल हैं, जो चैती, दादरा, कजरी, ख्याल और टप्पा को काफी पसंद कर रहे हैं।
पं. आशीष ने बताया कि वह गुयाना में 300 लोगों को संगीत सिखा रहे हैं। इसमें छह साल से 80 साल तक के लोग शामिल हैं। वहां लोग भारतीय भजनों के साथ ठुमरी, दादरा और होरी को ज्यादा पसंद करते हैं। उन्होंने बताया कि वहां करीब 40 फीसदी भारतीय मूल के लोग होने के कारण भारतीय परंपरा, त्योहार और पर्व उल्लास के साथ मनाए जाते हैं।
उन्हें कबीर, तुलसीदास, रैदास आदि संतों के पदों के अलावा जयशंकर प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त जैसे साहित्यकारों की रचनाएं भी सिखाई जाती हैं। बनारस घराने के तबला वादक आशीष मिश्रा रूस और विष्णु मिश्रा तंजानिया में गायन प्रस्तुत कर चुके हैं।
हिंदी में गाते हैं बंदिशें, अंग्रेजी में समझते हैं भाव
गायन की बंदिशें हिंदी में सिखाई जाती हैं। पं. राहुल ने बताया कि इन बंदिशों के भावों को अंग्रेजी में अनुवाद कर समझाया जाता है। बंदिशों में ‘पिया गए परदेस...’ और ‘चैत मास बोले रे कोयलिया...’ जैसी रचनाएं हिंदी में ही गाई जाती हैं। गायन का अभ्यास भी इसी प्रकार कराया जाता है। उन्होंने बताया कि शास्त्रीय संगीत सीखकर विदेशी कलाकार अपने संगीत को निखारने में काफी मदद महसूस करते हैं। स्वामी विवेकानंद कल्चर सेंटर, गुयाना के निदेशक रुद्र जयंतमवती ने बताया कि यह सबसे पुराना केंद्र है। यहां गिरमिटिया भारतीयों की बड़ी संख्या होने से भारतीय संस्कृति की जड़ें काफी मजबूत हैं। इसलिए यहां भारतीय लाइब्रेरी भी खोली गई है।