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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   The sky was hazy dust of the streets

सड़कों की धूल ने धुंधला किया आसमान

Wed, 21 Sep 2016 01:53 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Wed, 21 Sep 2016 01:53 AM IST
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टूटी सड़कों, अधबने पुलों और पाइप लाइन के लिए खोद कर छोड़ी गई पटरियों से शहर में जबरदस्त वायु प्रदूषण फैल रहा है। धूल कणों से मंगलवार की सुबह आसमान में कोहरे की मानिंद धुंध छा गई। पता चला कि यह मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि फर्राटा भरते वाहनों से उड़ती सड़कों के गर्द-ओ-गुबार का असर है। हवा में सूक्ष्म धूल और गैस कणों की मात्रा सामान्य से चौगुना अधिक पाई गई। शहर में खतरनाक स्तर तक पहुंचा वायु प्रदूषण जन स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। सांस और त्वचा संबंधी बीमारियां बांटने के साथ प्रदूषित हवा लोगों के फेफड़े कमजोर कर रही है। अगर शहर में निर्माण के तौर-तरीके नहीं बदले और प्रशासन ने वायु प्रदूषण रोकने की दिशा में जल्द कड़े इंतजाम नहीं किए तो हालात का सामना कर पाना मुश्किल हो जाएगा।
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काशी के वातावरण में धूल के सूक्ष्म कणों की अधिकता के चलते फेफड़े, गले, आंख और त्वचा की बीमारियाें का खतरा बढ़ गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार मंगलवार को वातावरण में 10 (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) की मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की जगह 207 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाई गई। इसी तरह सूक्ष्म धूल और गैस कणों की मात्रा पीएम 2.5 की मात्रा भी 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के विपरीत 187 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई। सितंबर के महीने में बेतहाशा उड़ती धूल के चलते आसमान का रंग धुंधला नजर आने लगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ सहायक वैज्ञानिक अधिकारी सुरेश चंद्र शुक्ल बताते हैं कि इस शहर में खोद कर छोड़ी गई सड़कों की वजह से वायु प्रदूषण ज्यादा बढ़ रहा है। जब तक निर्माण के तौर तरीके नहीं बदलेंगे, तबतक प्रदूषण की मार से लोग जूझते रहेंगे। हालांकि इसके लिए मानक तैयार किए गए हैं लेकिन ठेकेदारों, कार्यदायी संस्थाओं की ओर से इसका पालन नहीं किया जा रहा है। बेपटरी यातायात व्यवस्था के साथ ही क्षमता से अधिक वाहनों के सड़कों पर चलते की वजह से भी वायु प्रदूषण में इजाफा हो रहा है।
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शहर में विकास कार्यों के नाम पर जगह-जगह सड़कें खोदी गईं। कहीं काम समय पर पूरा नहीं हुआ तो कहीं काम पूरा होने के बाद भी सड़कें जस की तस छोड़ दी गईं। सड़कों पर उड़ती धूल लोगों को बीमार कर रही है। दो साल में दमा के मरीजों की संख्या में दो गुना वृद्धि हुई है। वरिष्ठ श्वांस एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ.एसके पाठक के मुताबिक दो साल पहले तक ओपीडी में 20 से 25 मरीज आते हैं जिनकी संख्या बढ़कर 50 से 60 तक पहुंच गई है। अस्थमा के अलावा सीओपीडी, एलर्जी के भी खतरे बढ़ गए हैं। हवा में खतरनाक तत्वों की मात्रा बढ़ने से लोगों के फेफड़े कमजोर हो रहे हैं। सांस की नलियों में धूल के कण जम जाते हैं और उससे फेफड़े में सूजन आ जाती है। इससे निमोनिया, टीबी की आशंका बढ़ जाती है।
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