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संस्कृत विश्वविद्यालय के वैभवशाली इतिहास को किया पुनर्जीवित

Sun, 23 May 2021 01:13 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 23 May 2021 01:13 AM IST
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The rich history of Sanskrit University revived
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल का तीन साल का कार्यकाल 23 मई को समाप्त हो रहा है। वर्तमान कुलपति प्रो. शुक्ल ने विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास को संरक्षित करने के साथ ही शास्त्रार्थ और वेदों की लुप्त हो रही शाखाओं को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 33वें कुलपति के रूप में उन्होंने जब पदभार ग्रहण किया तो कहा था कि प्राच्य विद्या को आधुनिक ज्ञान विज्ञान के साथ जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। तीन साल के कार्यकाल में कुलपति प्रो. शुक्ल ने विश्वविद्यालय की लुप्त परंपराओं को फिर से पुनर्जीवित किया। इसमें करपात्र स्वामी पुरस्कार, स्वरूपानंद सरस्वती पुरस्कार, शास्त्रार्थ परंपरा, शास्त्र प्रौढ़ी, वेद शाखा स्वाध्याय, श्रौत एवं स्मार्त यज्ञ और 30 साल के बाद वाचस्पति और महामहोपाध्याय उपाधियों को दोबारा शुरू कराया।
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इसके साथ ही सौ साल से भी अधिक प्राचीन सरस्वती भवन संग्रहालय का जीर्णोद्धार व उसकी पांडुलिपियों के संरक्षण की शुरुआत कराई। इसके अलावा वेधशाला का जीर्णोद्धार, पंचदेव मंदिर और मुख्य भवन के जीर्णोद्धार के काम भी शामिल हैं। कुलपति के कार्यकाल में 18 साल के बाद शैक्षिक पदों पर नियुक्तियों की शुरुआत हुई। इसके अलावा दो दर्जन नवीन प्रकल्पों की भी शुरुआत की। इसमें पहली बार हुई अंतरराष्ट्रीय शास्त्रार्थ सभा, वेदविज्ञान अनुसंधान केंद्र की स्थापना, पं. मुरालीलाल शर्मा स्मृति यंत्रालय की स्थापना, मारीशस व नेपाल से अनुबंध, सुप्रभातम व सुभाषित वीथिका प्रमुख हैं। कुलपति के कार्यकाल में ही कई सालों से लटकी एसआईटी की जांच भी पूरी हो गई।
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कुलपति के कार्यकाल में संस्कृत भाषा की हुई चातुर्दिक प्रतिष्ठा
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल के कार्यकाल पूर्ण होने पर राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने उन्हें बधाई दी है। वक्ताओं ने कहा कि प्रो. शुक्ला के कार्यकाल में विश्वविद्यालय एवं संस्कृत भाषा की गरिमा की चतुर्दिक प्रतिष्ठा हुई है। शनिवार को महासंघ की ओर से आयोजित ऑनलाइन बैठक में वक्ताओं ने कहा कि कुलपति ने लुप्तप्राय परंपरा और ज्ञानचर्चा की शुरुआत करके विश्व में विश्वविद्यालय की ख्याति फैलाई। इस दौरान महासंघ संस्कृत इकाई के प्रदेश अध्यक्ष प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, डॉ. अभिषेक पाठक, डॉ. राधारानी, डॉ. गोविंद मिश्र, अवधराम पांडेय, डॉ. दिनेश त्रिपाठी, डॉ. राजेश त्रिपाठी शामिल हुए।
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