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Varanasi News: काशी की गलियों से निकलकर सात समंदर पार पहुंची बनारस घराने की सरगम, युवा पीढ़ी ने बनाई पहचान

Sat, 21 Jun 2025 03:39 PM IST
नितीश कुमार पांडेय अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: नितीश कुमार पांडेय Updated Sat, 21 Jun 2025 03:39 PM IST
सार

कहते हैँ कि संगीत काशी के स्वाभाव में घुला हुआ है यहां की गलियों से निकलकर सात समंदर पार सरगत पहुंचाने का काम युवा पीढ़ी के साधक कर रहे हैं जिन्होंने संगीत साधना के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है। ये पूरी दुनियां को गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी से रसपान करा रहे हैं।
 

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The music of the Banaras Gharana reached across the seven seas from the streets of Kashi
तबला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बनारस घराने के सात सुरों की सरगम जो गलियों से निकलकर सात समंदर पार पहुंची थी, अब वह वटवृक्ष का स्वरूप ले चुकी है। बनारस घराने के कलाकार विदेशियों को संगीत का प्रशिक्षण दे रहे हैं तो, संगीत रसिक भी बनारस घराने के कलाकारों को हाथों हाथ ले रहे हैं।

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भारत रत्न पं. रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, कथक क्वीन सितारा देवी, गुदई महाराज की संगीत की विरासत आज वैश्विक पहचान बना चुकी है। तबला में पं. शुभ महाराज, गायन में रजनीश, रितेश व स्वरांश तो कथक में विशाल कृष्ण और सारंगी में संदीप और संगीत ने अपनी पहचान बनाई है।
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दुनिया में बनारस घराने की छठवीं और सातवीं पीढ़ी संगीत का प्रतिनिधित्व कर रही है। देश के बड़े-बड़े संगीत समारोह में प्रस्तुति देने के साथ ही इन कलाकारों के मुरीद लंदन, अमेरिका, जर्मनी, आस्ट्रेलिया में भी हैं। डिजिटल दुनिया ने संगीत की सरहदों की दूरी कम कर दी है।
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बात करें तबले की तो पं. कंठे महाराज, हरि महाराज, पं. किशन महाराजजी वंशावली को छठवीं पीढ़ी के शुभ महाराज की देश ही नहीं दुनिया भर में तबले की थाप गूंज रही है। यूरोप के अलावा दक्षिण अफ्रीका में भी उनके तबले के मुरीद हैं।

पं. रामसहाय के परिवार के पं. संजू सहाय का तबला सात समंदर पार लंदन में बज रहा है। पं. छोटकू महाराज की छठवीं पीढ़ी के सरोद वादक अंशुमान महाराज देश-विदेश में सरोद का जादू बिखेर रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय संगीत की विदेशों में मांग बढ़ी है। वहां के कलाकार यहां पर आकर प्रस्तुति दे रहे हैं।

कथक क्वीन सितारा देवी के नाती विशाल कृष्णा देश के साथ ही विदेशों में भी कथक का जादू बिखेर रहे हैं। वह ऑनलाइन विदेशी शिष्यों को कथक की कला भी बांट रहे हैं।


विदेशी शिष्यों को दे रहे सितार की शिक्षा

पद्मश्री पं. शिवनाथ मिश्र के पुत्र पं. देवब्रत मिश्र 1994 से विदेशी मंचों पर सितार वादन की प्रस्तुति कर रहे हैं। वर्तमान में तो उनके विदेशी शिष्यों की संख्या भी काफी ज्यादा है। कुछ तो बनारस आकर और कुछ ऑनलाइन ही सितार का प्रशिक्षण लेते हैं।

उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता सितार वादक पं. शिवनाथ मिश्र से ली है। पं. कन्हैया लाल मिश्र के शिष्य पं. अनीस मिश्रा ने सबसे कठिन वाद्ययंत्र सारंगी की तान ऐसी साधी कि आज वह देश के नामचीन सारंगी वादकों में गिने जाते हैं। विलुप्त होते वाद्ययंत्रों में शामिल सारंगी का प्रशिक्षण वह नई पीढ़ी को भी प्रदान कर रहे हैं।

विरासत में मिला है संगीत

सितारवादक पं. अमरनाथ मिश्र के जुड़वा पुत्र सौरव और गौरव मिश्र कथक की साधना कर रहे हैं। देश भर के सभी बड़े संगीत मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दे चुके दोनों कथक नर्तकों को संगीत विरासत में मिला। बेहद खास बात तो यह है कि उनके दादा पं. भवानी मिश्र सारंगी वादक, नाना श्रीचंद्र मिश्र गायक और पिताजी सितारवादक हैं। उन्होंने पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज से भी कथक की शिक्षा ली है।

पद्मश्री पं. शिवनाथ मिश्र ने बताया कि गीत-संगीत में बनारस घराना सबसे मजबूत है। यहां पर चारों विधाएं, जिसमें गायन वादन के साथ ही तबला और शास्त्रीय संगीत भी शामिल है। बनारस एकमात्र ऐसा घराना है जहां संगीत के अलग-अलग आठ उपघराने हुए हैं।


इनमें रामापुरा घराना, कबीर चौरा घराना और बनारस के कई अलग-अलग इलाकों में रहने वाले बड़े संगीतकार और उनके परिवारों के प्रदर्शन की वजह से उन्हें अलग घराने के तौर पर पहचान मिली। यह घराना गायन और वादन दोनों कलाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है. इस घराने के गायक ख्याल गायकी के लिए जाने जाते हैं।

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