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कामायनी के रचनाकार के घर की ऊबड़-खाबड़ है डगर

Fri, 06 Aug 2021 01:33 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 06 Aug 2021 01:33 AM IST
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The house of Kamayani's creator has a rough road
हिंदी की नई काव्यधारा को जन्म देने वाले महाकवि जयशंकर प्रसाद की निशानियां आपको शहरभर में ढूढने से भी नहीं मिलेंगी। महाकवि के आवास तक जाने वाली गली तक की सुध लेने वाला कोई नहीं है। ऊबड़-खाबड़ गली में गंदगी का ढेर व्यवस्था की पोल खोलता है। अनदेखी का आलम यह है कि उनकी शहरभर में एक प्रतिमा तक नहीं है। सरायगोवर्धन स्थित मोहल्ले में नई पीढ़ी को तो पता भी नहीं है कि उनके मोहल्ले में जयशंकर प्रसाद का आवास किधर है।
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सरायगोवर्धन मोहल्ले में जन्मे महाकवि जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक भवन प्रसाद भवन तक पहुंचना आसान नहीं है। सड़क से मात्र सौ मीटर दूर स्थित प्रसाद भवन तक पहुंचने में कूड़ा-करकट, सीवर, गंदगी और गोबरयुक्त टूटी-फूटी गलियों से होकर गुजरना पड़ता है। गलियों को देखकर यह अहसास ही नहीं होता है कि यहां कभी महान कृति कामायनी की रचना हुई होगी। अजर-अमर साहित्यकार ने साहित्य की सभी विधाओं में काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी और निबंध में नए प्रतिमान स्थापित किए, लेकिन उनकी स्मृतियां, मकान, गलियां और मोहल्ला बदहाल और बेजार है। प्रसाद भवन के बाहर नागरी प्रचारिणी की ओर से लगवाया गया शिलालेख देखकर ही पता चलता है कि यह भवन महाकवि जयशंकर प्रसाद का है। देश विदेश से विद्वान अपने-अपने शोधकार्य के संबंध में जयशंकर प्रसाद के निवास स्थान कालीमहाल स्थित सरायगोवर्धन के प्रसाद मंदिर आते रहते हैं और एक खराब छवि लेकर वापस जाते हैं।
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विवाद मे फंसकर नष्ट हो रही हैं स्मृतियां
जयशंकर प्रसाद की प्रतिमा की स्थापना के लिए प्रयास कर रहे अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि परिवार के झगड़े में कामायनी तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में पहुंच गई। दुखद पहलु यह है कि परिवार की मुकदमेबाजी में जयशंकर प्रसाद की स्मृतियों से देश आज भी अनजान है। उनकी कलम, रुद्राक्षमाला, भस्मपात्र, नेपालीखुखरी जो नेपाल नरेश ने दी थी, चश्मे का लेंस, एकमात्र दांत, वस्त्र, प्रसादजी की कटोरी, गिलास चम्मच सब बक्से में बंद होकर खराब हो रहा है। कामायनी लेखन पर जो हिंदी साहित्य सम्मेलन ने संवत 1994 में ताम्रपत्र, मंगलाप्रसाद पारितोषिक दिया था, नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा संवत 1982 में मिला गुलेरीपदक और संवत 1991 में सुधाकर पदक परिवार के एक पक्ष के कब्जे में है। कोई दूसरा आज तक उनका दर्शन नहीं कर सका है। आंसू, इरावती, दाशराज युद्ध, तितली, लहर के गीत एवं स्फुट कविताएं, ध्रुवस्वामिनी, चन्द्रगुप्त की मूल पांडुलिपियां दिल्ली में हैं या फिर बक्से में बंद कोई ठीक -ठीक बताने की स्थिति में नहीं है।
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