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सुबह-ए-बनारस: काशी विश्वनाथ को रोज शहनाई से जगाते थे बिस्मिल्लाह खान, मंगल स्वरों से होता था बाबा का अभिषेक

Sun, 21 Jul 2024 10:09 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 21 Jul 2024 10:09 AM IST
सार

Varanasi News: विश्व विख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान को जानने वाले आज भी उनके रवायत के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। बिस्मिल्लाह में जो बनारसियत थी, शायद ही किसी में हो। यही कारण है कि उन्होंने बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब को कायम रखा। 

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Subah e Banaras Bismillah Khan used to wake Kashi Vishwanath everyday with shehnai
अपने नाती और नतिनियों के साथ बिस्मिल्लाह खान। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू करके...। नजीर बनारसी का ये शेर सार्थक होता था काशी विश्वनाथ के आंगन में। जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से काशीपुराधिपति जागते थे और सुबह-ए-बनारस का आगाज होता था।

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बनारस की सुबह पूरी दुनिया में मशहूर है। यह और अधिक खूबसूरत हो जाती थी, जब बनारस के मंदिरों में एक ओर घंटियों की टन-टन तो दूसरी ओर शहनाई की धुन साथ-साथ बजती थी। वादन से पहले उस्ताद शहनाई की गंगा के पानी से वजू (सफाई) करते थे।
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इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके मंदिर प्रांगण के नौबतखाने में मंगला आरती से पहले उस्ताद राग भैरवी में तान छेड़ते थे। इससे मंदिर के कण-कण का शिवत्व जागृत हो उठता था। बाबा के अनन्य भक्त के रूप में जब वह रूह से शहनाई में फूंक मारते थे तो श्रद्धालु भी महसूस करते थे कि शिव के पंचाक्षरी मंत्र उनके कानों में गूंज रहे हों।

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Subah e Banaras Bismillah Khan used to wake Kashi Vishwanath everyday with shehnai
सुबह-ए-बनारस के मिजाज को बनाए रखने वाले बिस्मिल्लाह खान। - फोटो : अमर उजाला

शहनाई को ही बना लिया इबादत का साधन
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी कहते हैं, बिस्मिल्लाह खान मंदिर के पास के ही मोहल्ले में अपने मकान की सबसे ऊपरी मंजिल पर रहा करते थे। उनके कमरे की एक खिड़की काशी विश्वनाथ मंदिर की दिशा में खुलती थी। जब तक उस्ताद जिंदा रहे वे बाबा भोलेनाथ को भोर में शहनाई बजाकर जगाते रहे। 

उनके साथ यह रवायत भी चली गई। वे ऐसे मुसलमान थे जिन्होंने हिंदू मंदिर में रियाज किया और शहनाई को ही इबादत का साधन बना लिया। बनारस से अपने रिश्ते के बारे में वे कहते थे कि गंगाजी सामने हैं, यहां नहाइए, मस्जिद है, नमाज पढ़िए और बालाजी मंदिर में जाकर रियाज करिए।

नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि एक बार किसी ने पूछा कि इस्लाम में संगीत कुफ्र (नास्तिकता) है तो उस्ताद ने कहा कि अरे मियां जब कुफ्र है तो अली अकबर खां, विलायत खां, अमान अली अयान अली और बिस्मिल्लाह खां निकले हैं। अगर कुफ्र न होता तो क्या होता? 

काशी विश्वनाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, बड़ा गणेश की बारादरी और दुर्गा मंदिर की बारादरी हर जगह उस्ताद की शहनाई ने अपनी धुनों से साधना की है। रामनगर का किला से दिल्ली का लालकिला उस्ताद की शहनाई का पर्याय बन गया। वे बालाजी घाट पर स्नान करते और बालाजी मंदिर के बाहर बैठकर शहनाई का रियाज करते। बनारस से ऐसा प्यार करने वाला ढूंढना मुश्किल है। जब अमेरिका ने कहा कि आप हमारे यहां आ जाएं तो उन्होंने कहा कि मेरी गंगा कहां से लाओगे।

Subah e Banaras Bismillah Khan used to wake Kashi Vishwanath everyday with shehnai
विश्व विख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान। - फोटो : अमर उजाला

मामा से मिली थी शहनाई की रवायत
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के मामा काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थे। बिस्मिल्लाह का भी मन होता कि वे बाबा दरबार में हाजिरी लगाएं। आखिरकार उनके मामा ने उन्हें काशी विश्वनाथ मंदिर में अपने साथ शहनाई बजाने का मौका दिया।

इसके बाद बाबा विश्वनाथ से उनका नाता सदा के लिए जुड़ गया। मुसलमान होने के बाद भी वह माता सरस्वती को पूजते थे और उनसे अपनी कला को और बेहतर बनाने की दुआ मांगते थे।

शहनाई पर गूंजा था आजाद भारत का पहला राग
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के जश्न में उस्ताद को भी निमंत्रण दिया था। उस दिन पूरे हिंदुस्तान ने उस्ताद की शहनाई से भारत की आजादी का पहला राग सुना था। 1950 में पहले गणतंत्र दिवस पर भी उस्ताद ने लाल किले से राग कैफी पेश किया था। आज तक वह राग गणतंत्र दिवस के मौके पर बजाया जाता है।

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