Varanasi News: दुनिया के किसी भी विवि के छात्र कर सकेंगे पांडुलिपियों का अध्ययन, जानें इस व्यवस्था के बारे में
Varanasi News: सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना 1791 में कर्णघंटा मोहल्ले में हुई थी। 1907 में प्रिंस ऑफ वेल्स के निरीक्षण के बाद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में सरस्वती भवन का निर्माण शुरू हुआ और 1914 में यह बनकर तैयार हुआ। पं. गोपीनाथ कविराज पुस्तकालय के पहले पुस्तकालयाध्यक्ष थे। 1980 तक देश भर से पांडुलिपियां पुस्तकालय में पहुंचती रहीं।
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के दरवाजे अब विश्व भर के शोध छात्रों के लिए खुल गए हैं। दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के शोध छात्र सरस्वती भवन पुस्तकालय की पांडुलिपियों का अध्ययन कर सकेंगे।
सौ साल से अधिक प्राचीन पुस्तकालय की पांडुलिपियों का अध्ययन सिर्फ संस्कृत ही नहीं आईआईटी और कृषि के छात्र भी कर सकेंगे। छात्रों को इससे शोध में भी मदद मिलेगी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी शुरुआत कर दी है। अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय से एक शोध छात्रा ने व्याकरण और वेदांत की पांडुलिपियों के अध्ययन के लिए संपर्क भी किया है।
इसके अलावा कई विश्वविद्यालयों के शोध छात्र व अध्यापक भी संपर्क में हैं। सबसे अधिक मांग वेदांत, धर्म, दर्शन व्याकरण और ज्योतिष की है। इसके अलावा कृषि और यंत्रशास्त्र की भी पांडुलिपियां हैं।
एक लाख से अधिक पांडुलिपियां हैं संरक्षित
सरस्वती भवन में प्राचीन कृषि शास्त्र पर आधारित पांडुलिपियां हैं, जो कृषि के शोध छात्रों के लिए सहायक हैं। इसमें कृषि के प्राचीन तौर तरीकों के बारे में विस्तार से बताया गया है। साथ ही प्राचीन यंत्रशास्त्र की पांडुलिपियां हैं, जिसमें पुराने जमाने के यंत्रों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है।
यह पुस्तक आईआईटी और इंजीनियरिंग के शोध छात्रों के लिए उपयोगी होगी। पुस्तकालयाध्यक्ष प्रो. राजनाथ ने बताया कि अध्ययन के लिए उद्देश्य और गाइड का एप्रूवल लेटर देना होगा। शोध छात्र अपने संबंधित विषय के लिए ही आवेदन कर सकेंगे। उन्हें पांडुलिपियों की फोटो कॉपी उपलब्ध कराई जाएगी।