फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Stone pieces and food grains will tell story of Gyanvapi ASI survey will reveal truth

Gyanvapi: पत्थर के टुकड़े और अन्न के दाने बताएंगे ज्ञानवापी की कहानी, एएसआई सर्वे से सामने आएगा सच

Mon, 24 Jul 2023 12:07 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Mon, 24 Jul 2023 12:07 AM IST
सार

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी परिसर का सर्वे होगा। जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने शुक्रवार को बड़ा आदेश सुनाया और ज्ञानवापी में सील वजूखाने को छोड़कर पूरे परिसर के सर्वे का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को दिया।

विज्ञापन
Stone pieces and food grains will tell story of Gyanvapi ASI survey will reveal  truth
ज्ञानवापी परिसर में बीते साल मई में भी हुआ था सर्वे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी परिसर के वैज्ञानिक सर्वे से दुनिया के सामने इतिहास का सच सामने आ जाएगा। एएसआई के सर्वे में पत्थर के टुकड़े और अन्न के दाने अपने कालखंड की कहानी खुद ब खुद बताएंगे। इसमें एएसआई ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार, उत्खनन के साथ ही कार्बन डेटिंग भी कर सकता है। बीएचयू के इतिहासकारों का कहना है कि एएसआई सर्वे के बाद स्थितियां साफ हो जाएंगी।

विज्ञापन


बीएचयू के इतिहासकार प्रो. ओएन सिंह कहना है कि सर्वे की प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिकता पर निर्भर होती है। इसमें चिन्हित स्थानों के अलग-अलग जगहों पर ट्रेंच लगाते हैं। इस दौरान मिलने वाले पत्थर के टुकड़े, अन्न के दाने, मूर्तियां, अभिलेख व हर छोटी से छोटी वस्तु भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। मूर्तियों के समय का निर्धारण प्रतिमाशास्त्र के ग्रंथों से मिलान करने के बाद होता है।
विज्ञापन

ये भी पढ़ें: मामले की सुनवाई महज 67 दिन में पूरी, फैसले को हिंदू पक्ष क्यों बता रहा बड़ी जीत?

विज्ञापन
विज्ञापन

हवनकुंड मिला मतलब हिंदू परिसर होने का प्रमाण

अगर परिसर में पूजा पाठ हो रहा होगा तो कहीं न कहीं हवनकुंड भी जरूर होगा। हवनकुंड मिल जाएगा तो उसकी कार्बन डेटिंग से हिंदू परिसर होने का प्रमाण मिल सकता है। शैव परंपरा के मंदिरों में शिवलिंग, नंदी और जल निकासी का स्थान निर्धारित होता है। बभनियांव की खोदाई में कुषाणकालीन शिवलिंग के प्रमाण मिले थे। सापेक्ष और निरपेक्ष डेटिंग पद्धति के जरिये एएसआई सर्वे कर सकता है।

ये भी पढ़ें: ज्ञानवापी परिसर के ASI से सर्वे से पहले वाराणसी में हाई अलर्ट, मुस्लिम पक्ष ने किया बहिष्कार का एलान

पहले भी हुआ सारनाथ का वैज्ञानिक सर्वे, अब माइक्रो डेटिंग का जमाना

बीएचयू के इतिहासकार प्रो. अशोक सिंह का कहना है कि अब तो माइक्रो डेटिंग का जमाना है, अगर एक अनाज का दाना भी मिल गया तो उसकी डेटिंग से उसकी असली तारीख पता चल जाएगी। पहले भी प्रो. कृष्णनन ने सारनाथ का सर्वे किया था। सर्वे के जरिये देखने का प्रयास हुआ था कि जो स्ट्रक्चर दिख रहा है, उसके अतिरिक्त और क्या-क्या है? वर्तमान में जो कुछ दिख रहा है, उससे ज्यादा सारनाथ की जमीन के नीचे है। रडार सर्वे तकनीक के जरिये तीन से चार मीटर का सर्वे हुआ था। एएसआई के सामने रडार सर्वे के अलावा ट्रेंच लगाने का भी विकल्प है।

इतिहासकारों ने पहले ही प्रस्ताव दिया था कि ज्ञानवापी परिसर से 50 मीटर की दूरी में ट्रेंच लगाकर सर्वे किया जा सकता है। इससे पता चल जाएगा कि यह परिसर कितने पहले आबाद हुआ होगा? कौन सी बस्ती सबसे पहले बनी होगी? अभी तक जो अनुमान है, उसे तथ्यों के साथ कहा जा सकेगा। बभनियांव की खुदाई से पता चला कि शिवलिंग की परिकल्पना दो सौ एडी से शुरू हो गई। संभावना है कि यहां उससे भी प्राचीन तथ्य मिल सकते हैं। सर्वे से बहुत सारी तथ्यपरक चीजें स्पष्ट हो जाएंगी।

सर्वे में हो सकता है दो पद्धतियों का इस्तेमाल

इतिहासकार के मुताबिक, पुरातात्विक सर्वे का मुख्य उद्देश्य है कि उक्त स्थल पर धार्मिक ढांचा किसी अन्य धार्मिक निर्माण पर तो नहीं बनाया गया है। पुरावशेष में क्या बदलाव किया गया है? यदि ऐसा है तो उसकी निश्चित अवधि, आकार, वास्तुशिल्पीय डिजाइन और बनावट विवादित स्थल पर वर्तमान में किस रूप में है? जांच में जीपीआर (ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार) अथवा जिओ रेडियोलॉजी सिस्टम अथवा दोनों का प्रयोग कर सर्वेक्षण कर सकती है। 

बिना खोदाई कराए जमीन से 15 मीटर नीचे की जानकारी

प्रो अशोक सिंह के मुताबिक जीपीआर सर्वे की इस अत्याधुनिक तकनीक से बिना खोदाई कराए जमीन से 15 मीटर नीचे तक की सभी जानकारियां आसानी से मिल जाती हैं। काशी की प्राचीनता के लिहाज से यह बहुत जरूरी है कि खोदाई के समय क्षेत्र की सभ्यता का ध्यान रखा जाए। ऐसी महत्वपूर्ण जगहें भी होती हैं, जहां ऐतिहासिक धरोहरें दबी होती हैं। खोदाई में इनके नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है। एक किलोमीटर के जीपीआर सर्वे पर करीब दस हजार रुपये तक का खर्च आता है। इससे किसी तरह का उस क्षेत्र को कोई भी नुकसान नहीं होता है।

जीपीआर सर्वे का आधुनिक तरीका

इतिहासकार ने बताया ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) एक भू-भौतिकीय विधि है, जो उपसतह की छवि के लिए रडार का उपयोग करती है। यह कंक्रीट, तारकोल, धातु, पाइप, केबल या चिनाई जैसी भूमिगत उपयोगिताओं की जांच करने के लिए उपसतह का सर्वेक्षण करने का एक तरीका है।

विकास कार्यों के लिए हो चुका है सर्वे

बनारस के विकास कार्यों के लिए वर्ष 2017 में सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. स्वर्णा सुब्बाराव के निर्देशन में इसी तकनीक से सर्वे किया गया था। 2017 में देश में पहली बार बनारस में ही इस तकनीक से अंडर ग्राउंड मेट्रो के लिए सर्वे किया गया था। इसमें विद्यापीठ के तत्कालीन कुलपति प्रो. पी नाग भी थे।
एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद अविनाश मोहंती ने बताया कि अभी कोर्ट का आर्डर नहीं आया है, आदेश मिलने के बाद ही इस मामले में कुछ कहा जा सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed