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पत्थर खाकर जख्मी हुआ, जलकर रोया काशी का दिल

Tue, 06 Oct 2015 02:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 06 Oct 2015 02:20 AM IST
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Stone ate was injured, burnt cried Kashi Heart
हमेशा अलमस्त रहने का वरदान जिसे, जो कभी सोता न था, जो कभी रोता न था, वही काशी का दिल गोदौलिया मानो अपनी चिता पर धधक रहा था। हर हाथ में पत्थर, हर आंख में चिंगारी। पत्थर पड़े गोदौलिया पर, चिंगारी से जला गोदौलिया। धर्म, अध्यात्म और संस्कृति जहां हर आंगन में पलता हो, वहां ऐसा हंगामा और विध्वंस देखकर काशी की आत्मा कांप गई।
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काशी माने गोदौलिया, एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते चलते लोग, चौराहों पर देर रात तक चलती अड़ियां और बाजारों में कभी खत्म न होने वाली रौनक। जहां गंभीर चर्चा भी बनारसी पान के बीड़े से शुरू होती है और पीक पर खत्म। ऐसे में भला क्या हो गया धैर्य टूटा, संयम खो गया। विवाद तो पहले से ही विकराल होने को उतावला था। मन तो पहले से ही आशंकित था कि कुछ होगा लेकिन जो हुआ वो कंपाने वाला था। लक्सा के कैलाश नाथ यादव बताते हैं कि पहले भी दंगे हुए, बवाल हुआ, काशी तक भी इसकी आंच पहुंची। लेकिन, काशी की जीवनदायिनी गंगा सबको एकजुट करने वाली रही। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सभी इसे बचाने संवारने के लिए हमेशा आगे आए। कहीं कोई बाधा नहीं, विचारों में कोई मतभेद नहीं।
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हमेशा सबको एकजुट करने वाला गोदौलिया इस बार भी निश्चिंत था कि जो झगड़ा है, सुलझ जाएगा। प्रतिकार यात्रा के दौरान भी लोगबाग हमेशा की तरह ही गोदौलिया बाजार से दशाश्वमेध घाट तक मौजूद थे। दशाश्वमेध के विजय शंकर पांडेय कहते हैं कि कहीं कोई संशय नहीं था, पूरा यकीन था कि कुछ अनिष्ट नहीं होगा। बावजूद इसके चारों तरफ भीड़, पत्थर फेंकते लोग, पुलिस का लाठीचार्ज और आग की लपटों में गाड़ियां राख हो गईं। सब कुछ गोदौलिया की उन्हीं सड़कों पर हो रहा था जहां दिन-रात की जिंदादिली के किस्से मशहूर हैं। प्रतिकार यात्रा को लेकर प्रशासन सजग था, फोर्स भी थी। वहां जुटे लोग भी यहां की गलियों में पले-बढ़े थे जिनको यहां की हर दरख्त से मोह है। यकीनन हालात बदलेंगे। ये जख्मी है, जला है, खून के आंसू रोया है लेकिन हारा नहीं है। शांति फिर ठौर पाएगी।
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