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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Special on the death anniversary of Tabla Emperor Padmavibhushan Pt. Kishan Maharaj

पद्मविभूषण पं. किशन महाराज की पुण्यतिथि पर विशेष, कई कलाओं में थे निपुण, कबीर जैसा था मिजाज

Mon, 04 May 2020 10:56 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 04 May 2020 10:56 AM IST
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Special on the death anniversary of Tabla Emperor Padmavibhushan Pt. Kishan Maharaj
अपने शिष्य रजनीश मिश्र को गंडा बांधते पद्मविभूषण पंडित किशन महाराज। - फोटो : अमर उजाला।

पद्मविभूषण पं. किशन महाराज के तबले की थाप भले ही खामोश हो गई हो लेकिन उन्होंने जो संगीत का संस्कार बोया था वह पूरी दुनिया में गूंज रहा है। कबीरचौरा में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर जन्मे किशन महाराज भगवान श्रीकृष्ण की तरह कई कलाओं में निपुण थे तो मिजाज कबीर जैसा था। उनके स्वभाव में सहजता के साथ ही फक्कड़पन और अक्खड़पन भी था। 11 साल की उम्र से उनकी जो तबले की थाप शुरू हुई वह चार मई 2008 को थम गई थी।

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पिता पं. हरि महाराज और ताऊ पं. कंठे महाराज ने तबले पर थाप देना सिखाया तो पं.  किशन महाराज विरासत में मिली कला साधना से शीर्ष को छूते हुए पद्मविभूषण पाने वाले देश के पहले तबला वादक बने थे। देश के शीर्ष कलाकारों के साथ उन्होंने मंच साझा किया लेकिन जहां कुछ खला, उससे समझौता नहीं किया। पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य कहते हैं कि संगतकारों को सम्मान दिलाने में पं. किशन महाराज का योगदान अप्रतिम है।
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पद्मश्री डॉ राजेश्वर आचार्य।

एक बार का वाकया याद है जब पं. रविशंकर अमेरिका जा रहे थे तो पं. किशन महाराज को भी जाना था लेकिन वह नहीं गए। हमने जब उनसे पूछा कि आप क्यों नहीं गए तो उन्होंने कहा कि हम दोनों मित्र हैं लेकिन संगतकार को प्रमुख कलाकार से दूसरे दर्जे का समझने की जो प्रवृत्ति है उसकी दृष्टि से मैं मित्रता में तो रविशंकर को तुम करके बात करता हूं लेकिन अमेरिका जा रहे हैं तो वहां आप कहकर सम्मान कैसे दूंगा। मित्रता में जब भेद का प्रश्न आया तो मैंने मना कर दिया। जब बराबरी से बजा रहा हूं तो सम्मान भी बराबर मिलना चाहिए।

प्रख्यात शास्त्रीय गायक पद्मभूषण पं. राजन-साजन मिश्र कहते हैं कि उनका स्वतंत्र तबला वादनअलग-अलग अनुभूतियां दे जाता था। गायिका सोमा घोष का मानना है कि महाराज जी जैसी महारत वाला कोई तबला वादक दूर-दूर तक नहीं था। उनके शिष्य और नाती पं. रजनीश मिश्र ने भी उनसे गंडा बंधवाया था और आज भी वह उनका अनुसरण करते हैं।

पद्मश्री डॉ सोमा घोष।


जिंदगी को वर्तमान के शीशे में देखते थे
पं. किशन महाराज के पुत्र पं. पूरन महाराज कहते हैं कि पिताजी ने युवा अवस्था में कई फिल्मों में तबला वादन किया था। इनमें नीचा नगर, आंधियां, बड़ी मां आदि फिल्में प्रमुख हैं। उनका जिंदगी जीने का अंदाज बिंदास रहा। वह जिंदगी को हमेशा वर्तमान के शीशे में देखा करते थे। लुंगी कुर्ते में पूरे मोहल्ले की टहलान और पान की दुकान पर मित्रों के साथ जुटान ताजिंदगी उनका शगल बना रहा।

प्रमुख सम्मान -
1973 में पद्मश्री, 1984 में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार, 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार, 2002 में पद्मविभूषण सम्मान मिला। इसके अलावा दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार, ताल विलास, उत्तर प्रदेश रत्न, उत्तर प्रदेश गौरव, भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान भी उन्हें मिला था।

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