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आदिवासियों में कुछ ऐसी है परंपरा, यहां तो कंकड़ के खेल में तय हो जाते हैं जोड़े, होती हैं शादियां 

Mon, 27 Apr 2020 12:30 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, मिर्जापुर
अमर उजाला नेटवर्क, मिर्जापुर Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 27 Apr 2020 12:30 PM IST
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Sonbhadra border to Chhattisgarh and Madhya Pradesh tradition of marriage in mirzapur
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

मिर्जापुर जिले के आदिवासी समाज में आज भी कई ऐसी परंपरा हैं, जो आपको आश्चर्य में डाल देंगी। समाज के युवा कंकड़ का खेल खेलते हैं और इसमे बेहतर प्रदर्शन के आधार पर जोड़े तय हो जाते हैं और बाद में उनके बीच शादियां हो जाती हैं। लोग होली के दिन कंकड़ मार खेलते हैं। जहां पर केमिकल युक्त रंग एवं पानी का बिल्कुल प्रयोग नहीं होता और उसी दिन समुदाय के किशोर अपने बल पौरुष का परिचय देकर साथी को रिझाते हैं।

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छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश सोनभद्र से लेकर घोरावल मिर्जापुर जिले के पास वाले कुछ गांव में भील आदिवासी के कई गांव हैं, जहां आज भी यह परंपरा जीवित है। होली के दिन इस समुदाय के लोग सबसे पहले अपने कुलदेवता और अपने धनुष बाण की पूजा करते हैं, फिर घरों में पकवान बनाते हैं। दोपहर के समय मानर की थाप पर करमा नृत्य करते हुए एक दर्जन की झुंड में जंगली फूलों एवं अन्य सुगंधित फूलों की मदद से युवक-युवतियों पर फूलों से मारकर के होली खेलते हैं।
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गुलाल की जगह यह गुलाब एवं अन्य सुगंधित फूलों को उनके शरीर पर मलते हैं। इस समुदाय के श्यामल मींज जैकलिन ने बताया कि इस दिन हम लोगों के घरों में भी पकवान बनता है। पूजा के बाद मानर की थाप पर करमा नृत्य करते हुए पंडवानी पांडवों की वीर गाथा के गीत गाते हैं। इस दौरान महिलाएं पुरुषों पर कंकड़ बरसाती हैं।

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जैकलिन और श्यामल ने बताया कि होली में पानी का बिल्कुल प्रयोग नहीं होता। अबीर गुलाल की जगह प्राकृतिक फूलों का प्रयोग होता है। उसने यह भी बताया कि पांडवों की वीरगाथा से प्रेरित होकर कुंवारे लड़के किशोरियों के हाथ पकड़ते हैं, जो किशोर किशोरी के कंकर का बचाव करते हुए उसका हाथ पकड़ लेता है और किशोरी के लाख प्रयास करने के बाद भी हाथ नहीं छोड़ता। समुदाय के लोग उससे उसकी शादी करने की मुहर लगा देते हैं।

मिर्जापुर में इस समुदाय के लोग कम हैं। जो भी परिवार हैं वे छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश चले जाते हैं। अपनी लड़कियों को साथ लेकर और वहीं पर जाकर के विधिवत इस त्योहार को मनाते हैं और शादियों को पक्की करते हैं।

जड़ी बूटी व तंत्र-मंत्र से करते हैं उपचार
जंगलों में रहने वाले आदिवासी भील समुदाय के लोग अत्याधिक धार्मिक प्रवृति के होते हैं। देवी-देवताओं पर इनका अधिक विश्वास होता है। यह अपनी किसी भी बीमारी का इलाज जंगली जड़ी बूटियों एवं देवी उपासना से करते हैं। अत्यधिक बुखार आने पर अपने शरीर को गर्म लोहे से दागते है। विज्ञान के युग में आज भी यह अपने पुरानी परंपरा पर कायम है, पर अब कहीं कहीं ऐसा होता है।

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