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'अमर उजाला संवाद' में बोले शेखर सुमन- काशी कोई जगह नहीं, दर्शन और सोच है
amarujala.com, written by- अजीत कुमार सिंह
Updated Thu, 14 Sep 2017 01:03 PM IST
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शेखर सुमन
- फोटो : अमर उजाला
1984 में फिल्म उत्सव से फिल्मी कॅरियर की शुरूआत करने वाले शेखर सुमन ने बॉलीवुड में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। करीब 20 साल तक रुपहले पर्दे पर छाए रहे शेखर सुमन ने फूहड़ कामेडी से आमतौर पर परहेज किया।
संजय दत्त की कमबैक फिल्म ‘भूमि’ में खुद के किरदार को ‘कार्नर प्लाट’ जैसा बताते हुए कहते हैं कि स्पेशल एपियरेंस है। अपने कॅरियर, कॉमेडी, आने वाली फिल्म भूमि, काशी से रिश्ते के बारे में शेखर सुमन ने बुधवार को अमर उजाला से खुलकर बात की।
काशी के बारे में आपकी क्या धारणा है?
काशी किसी जगह का नाम नहीं है। ये एक फलसफा है, दर्शन है, सोच है। यहां लोग जिंदगी और मौत को समझने आते हैं। मणिकर्णिका घाट पर जाकर सत्य का पता चलता है। पता चलता है कि मौत भी हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है। काशी से मेरा ही नहीं, हर व्यक्ति का रूहानी रिश्ता है।
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पहली बार काशी कब आना हुआ था, इतने दिनों में यहां क्या बदलाव देखा?
बाबूजी के साथ 1968 में पहली बार आया था। शहर के अंदर घुसते ही पीछे से एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी। शहर में जो गड्ढे 1968 में थे, वो गड्ढे आज भी हैं। बहुत कुछ बदला लेकिन सड़कों का हाल नहीं बदला। शायद यही काशी की प्राचीनता है। यहां चीजें जल्दी बदलती नहीं है।
काशी विश्वनाथ के न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य प. अशोक द्विवेदी से पारिवारिक रिश्ता है। मंगलवार को दर्शन करने गया तो मंदिर के ऊपर सर्प के दर्शन हुए। गली से निकलते हुए करीब सौ साल के बुजुर्ग मिले, जिन्होंने मुझे पहचान लिया। ये दोनों बातें मेरे लिए चमत्कारिक हैं।
सिंपली शेखर और मूवर्स शेखर्स जैसे कार्यक्रमों की तुलना में आज के कॉमेडी शो को किस रूप में देखते हैं?
अब के शो में शालीनता, सुचिता और आध्यात्मिकता नहीं है। फूहड़ता बढ़ रही है। सजधज कर शो में आने वाली कलाकार भूत, प्रेत, सांप, बिच्छू आदि की बातें ज्यादा करती हैं। ये दुखद है। भूत के पांव उल्टे हैं। वह हमेशा पीछे भागता है। ऐसा नहीं है कि हम अच्छे विषयों पर शो नहीं बना सकते। माडर्न के फेर में अब अपना डीएनए खोते जा रहे हैं।
बीते कुछ समय से एक्टर, सिंगर, एंकर और अभिनेता बनने में क्या हीरो गुम हो गया है?
मैने हमेशा नई विधा सीखने का प्रयास किया है। यही सफलता का पैमाना है। किसी से तुलना करने की बजाय हमें खुद का कंपटीटर होना चाहिए। मूल रूप से मैं अभिनेता ही हूं। सोनी मैक्स पर मेरा एक कार्यक्रम इस समय भी चल रहा है।
इस समय बिहार में नीतीश कुमार का राज कैसा चल रहा है? फिर से राजनीति में लौटेंगे?
बिहार और गुजरात में शराबबंदी हुई जो कि अच्छा है। अगर यहां शराबबंदी हो सकती है तो अन्य प्रदेशों में क्यों नहीं। बिहार में अच्छा काम हो रहा है। लालू और नीतीश कुमार में कभी संधि तो कभी संधि विच्छेद होता रहता है। रही बात राजनीति की तो एक बार फिर जरूर इस क्षेत्र में लौटूंगा।
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संजय दत्त की कमबैक फिल्म ‘भूमि’ में खुद के किरदार को ‘कार्नर प्लाट’ जैसा बताते हुए कहते हैं कि स्पेशल एपियरेंस है। अपने कॅरियर, कॉमेडी, आने वाली फिल्म भूमि, काशी से रिश्ते के बारे में शेखर सुमन ने बुधवार को अमर उजाला से खुलकर बात की।
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काशी के बारे में आपकी क्या धारणा है?
काशी किसी जगह का नाम नहीं है। ये एक फलसफा है, दर्शन है, सोच है। यहां लोग जिंदगी और मौत को समझने आते हैं। मणिकर्णिका घाट पर जाकर सत्य का पता चलता है। पता चलता है कि मौत भी हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है। काशी से मेरा ही नहीं, हर व्यक्ति का रूहानी रिश्ता है।
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पहली बार काशी कब आना हुआ था, इतने दिनों में यहां क्या बदलाव देखा?
बाबूजी के साथ 1968 में पहली बार आया था। शहर के अंदर घुसते ही पीछे से एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी। शहर में जो गड्ढे 1968 में थे, वो गड्ढे आज भी हैं। बहुत कुछ बदला लेकिन सड़कों का हाल नहीं बदला। शायद यही काशी की प्राचीनता है। यहां चीजें जल्दी बदलती नहीं है।
काशी विश्वनाथ के न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य प. अशोक द्विवेदी से पारिवारिक रिश्ता है। मंगलवार को दर्शन करने गया तो मंदिर के ऊपर सर्प के दर्शन हुए। गली से निकलते हुए करीब सौ साल के बुजुर्ग मिले, जिन्होंने मुझे पहचान लिया। ये दोनों बातें मेरे लिए चमत्कारिक हैं।
सिंपली शेखर और मूवर्स शेखर्स जैसे कार्यक्रमों की तुलना में आज के कॉमेडी शो को किस रूप में देखते हैं?
अब के शो में शालीनता, सुचिता और आध्यात्मिकता नहीं है। फूहड़ता बढ़ रही है। सजधज कर शो में आने वाली कलाकार भूत, प्रेत, सांप, बिच्छू आदि की बातें ज्यादा करती हैं। ये दुखद है। भूत के पांव उल्टे हैं। वह हमेशा पीछे भागता है। ऐसा नहीं है कि हम अच्छे विषयों पर शो नहीं बना सकते। माडर्न के फेर में अब अपना डीएनए खोते जा रहे हैं।
बीते कुछ समय से एक्टर, सिंगर, एंकर और अभिनेता बनने में क्या हीरो गुम हो गया है?
मैने हमेशा नई विधा सीखने का प्रयास किया है। यही सफलता का पैमाना है। किसी से तुलना करने की बजाय हमें खुद का कंपटीटर होना चाहिए। मूल रूप से मैं अभिनेता ही हूं। सोनी मैक्स पर मेरा एक कार्यक्रम इस समय भी चल रहा है।
इस समय बिहार में नीतीश कुमार का राज कैसा चल रहा है? फिर से राजनीति में लौटेंगे?
बिहार और गुजरात में शराबबंदी हुई जो कि अच्छा है। अगर यहां शराबबंदी हो सकती है तो अन्य प्रदेशों में क्यों नहीं। बिहार में अच्छा काम हो रहा है। लालू और नीतीश कुमार में कभी संधि तो कभी संधि विच्छेद होता रहता है। रही बात राजनीति की तो एक बार फिर जरूर इस क्षेत्र में लौटूंगा।
हत्या और बलात्कार की घटनाएं ऑनलाइन माध्यम की देन
शेखर सुमन
- फोटो : अमर उजाला
आज के दौर की फिल्मों और सोशल मीडिया के उफान के सवाल पर शेखर सुमन ने कहा कि फिल्में अब यथार्थ के करीब आ रही हैं। दर्शक भी रियलिस्टिक फिल्में पसंद कर रहे हैं।
जहां तक यूट्यूब जैसे ऑनलाइन माध्यमों की बात है तो आज समाज में हर रोज विचलित कर देने वाली हत्या और बलात्कार की घटनाएं इसी माध्यम की देन हैं। फिल्मों में कुछ आपत्तिजनक होता है तो उसके लिए सेंसर बोर्ड है लेकिन यहां बेरोक-टोक सब कुछ उपलब्ध है।
हमें बदलते दौर के साथ और आधुनिक व सभ्य होना चाहिए था लेकिन यह सवाल मुझे अक्सर मथता है कि हम जंगली कैसे होते जा रहे हैं..? हमारी सोच जानवरों से बदतर कैसे होती जा रही है...? ये इन्हीं माध्यमों की देन है। इस पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए।
जहां तक यूट्यूब जैसे ऑनलाइन माध्यमों की बात है तो आज समाज में हर रोज विचलित कर देने वाली हत्या और बलात्कार की घटनाएं इसी माध्यम की देन हैं। फिल्मों में कुछ आपत्तिजनक होता है तो उसके लिए सेंसर बोर्ड है लेकिन यहां बेरोक-टोक सब कुछ उपलब्ध है।
हमें बदलते दौर के साथ और आधुनिक व सभ्य होना चाहिए था लेकिन यह सवाल मुझे अक्सर मथता है कि हम जंगली कैसे होते जा रहे हैं..? हमारी सोच जानवरों से बदतर कैसे होती जा रही है...? ये इन्हीं माध्यमों की देन है। इस पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए।