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लावारिस बच्चों को पिता जैसा प्यार दुलार देकर अंधेरी जिंदगी में उजाला भर रहे मऊ के शेखर तिवारी

Tue, 24 Nov 2020 12:08 AM IST
विचित्र सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मऊ Published by: विचित्र सिंह Updated Tue, 24 Nov 2020 12:08 AM IST
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Shekhar Tiwari director of Bal Shishu Grih Mau serving unclaimed children
बाल शिशु केंद्र के संचालक शेखर तिवारी। - फोटो : अमर उजाला।

लोक लाज या अन्य कारणों से लावारिस छोड़ दिए जाने वाले बच्चों को मऊ के शेखर तिवारी पिता बनकर पाल रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बाकायदा बाल शिशु गृह की स्थापना की है। इस समय यहां रहने वाले 15 बच्चों को वह पिता की अपनापन, प्यार और दुलार देकर उनकी अंधेरी जिंदगी में उजाला भर रहे हैं। 

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मुहम्मदाबाद गोहना कस्बे के शेखवाड़ा मुहल्ले के शेखर तिवारी दो साल से इस काम में जुटे हैं। वह लावारिस शिशुओं को अपना कर उनकी अंधेरी जिंदगी में उजाला कर रहे हैं। अक्सर लोक लाज, भय या अन्य किसी कारण से नवजात शिशुओं को लोग लावारिस छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों को अपनाकर वह वात्सल्य का संदेश दे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कस्बे के जमालपुर पोखरे पर बाल शिशु गृह की स्थापना की है।

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Shekhar Tiwari director of Bal Shishu Grih Mau serving unclaimed children

उन्होंने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता लेकर 28 अगस्त 2018 को बाल शिशु गृह शुरू किया है। इसमें मऊ, बलिया, गाजीपुर और जौनपुर जनपदों में मिलने वाले लावारिस बच्चों को रखे जाने की व्यवस्था है। इसमें एक माह से एक साल तक के 15 बच्चे रह रहे हैं।

शेखर तिवारी ने बताया कि दो साल बीतने के बावजूद सरकारी फंड और मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला है। बताया कि कई बार आर्थिक तंगी बढ़ जाने पर बैंक से लोन लेना पड़ता है, लेकिन वह अपने काम में शिद्दत से लगे हैं।

Shekhar Tiwari director of Bal Shishu Grih Mau serving unclaimed children

बताया कि सबसे अधिक समस्या बच्चों के इलाज में आती है। बच्चों के बीमार होने पर उन्हें स्थानीय चिकित्सकों के अलावा अक्सर जनपद मुख्यालय स्थित अस्पताल ले जाना पड़ता है। बताया कि इन चार जनपदों में लावारिस मिलने वाले शिशुओं का लेखा-जोखा केंद्र सरकार के पोर्टल पर फीड होता है।

इसके बाद कागजी कार्रवाई कर बच्चों को केंद्र पर लाकर रखा जाता है। बताया कि दो साल में इस केंद्र से सरकार की अनुमति से देश के विभिन्न राज्यों के नि:संतान दंपतियों ने 14 शिशुओं को गोद लिया है। इनकी देखभाल के लिए दो शिफ्ट में 12 सहयोगी और कर्मचारी लगे हैं। बच्चों के दूध, दवाई, कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य पर महीने में औसतन एक लाख खर्च आता है। इसे जन सहयोग और अपने संसाधन से पूरा करना पड़ता है।

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