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श्रावणी फुहार : बिरहा अगन लागी बूंदिया पड़े अंगिया जले जियरा ए सखि

Tue, 25 Jul 2017 04:36 PM IST
amarujala.com, written by अनूप ओझा
amarujala.com, written by अनूप ओझा Updated Tue, 25 Jul 2017 04:36 PM IST
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Sawan Many aspects of love and separation, rain season is the most unique
शिवानी कल्याणपुर - फोटो : अमर उजाला

सावन के बहुत पहलू हैं। प्यार भी होता है आतंक भी। सावन के आतंक को भी मैंने देखा है। 26 जुलाई को इसी महीने मेरा बर्थ डे था और उसी दिन मुंबई में बाढ़ आ गई थी। तीन दिन की बारिश में पूरी मुंबई डूब गई थी। जो जहां था वहीं कैद हो गया। घर के लोग घर में, आफिस के आफिस में।

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ट्रेन, बस सब कुछ बंद हो गया था। बाकी, सावन सावन मेरे दिल के बहुत करीब है। इसी महीने में प्रकृति निखरती है, सृजन होता है। हरियाली छाई रहती है। संगीत में उतर कर सावन अनोखा हो जाता है। यह कहना है कि ठुमरी गायिका शिवानी कल्याणपुर का...।

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शिवानी बताती हैं कि मल्हार, मेघ, देस रागों में विरह के अनेक भाव इस सावन से जुड़े हैं। सावन की पुकार प्रियतम की ही पुकार होती है। राग मेघ में अश्विनी भिड़े देशपांडे की बंदिश से वह शुरुआत करती हैं- श्याम घनश्याम श्याम रंग तन छायो/बादर के रूप श्याम प्रेम रंग बरसायो/उमड़ घुमड़ घटा घोर बादरवा करे शोर...।

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वह बताती हैं कि जैसे मेघ श्याम हैं वैसे ही पिया के रंग भी सांवले हैं। वर्षा होने वाली है। इस बंदिश में जिस वर्षा का वर्णन है, वह प्रेम की है। राग गौड़ मल्हार का वह उदाहरण देती हैं- मान न करिए गोरी तुम्हरे कारन आयो मेहा.../ हरी हरी भूमि पर बरसो ही छायो...। शिवानी सावन के गीतों में डूब जाती हैं।

वह कहती हैं कि मल्लार, कजरी में सावन के काले बादल और परदेसी प्रियतम को लेकर एक जैसे ही भाव रचे गए हैं। वह बंदिश के जरिए इस विरह पर रोशनी डालती हैं-बैरी बदरा काहे सताए जाने कौन घड़ी सैंया आए.../ नेह पिया संग क्यों कर बैठी सब सखियन तो हमसो रूठी.. रह रह जी घबराए...।

शिवानी कहती हैं कि सावन का आना और पिया का न आना ही इस ऋतु का सौंदर्य है। सावन की रुत आई रे सजनिया प्रीतम घर नहिं आए...वह राग भूपेश्वरी में दूसरी बंदिश पेश करती हैं- कारी बदरिया घेरी पिया नहिं पास अब कैसे करूं सखि.../ बिरहा अगन लागी बूंदिया पड़े अंगिया जले जियरा कैसे करूं सखि ए री...।

वह इश महीने में गाए जाने वाले झूला की बंदिश पर आलाप लेती हैं- झमकि झुकि आई बदरिया कारी झूला झूलें नंदकिशोर.../ झूमि झूमि झूमि झोंका दे सखिया ठाढ़ी दोउ ओर...। वह बताती हैं कि प्रेम की बारिश में भीगने पर झूले की पेंग धीमी करने की मनुहार भी मिलती है- बदरिया बरसे रे सैंया झूला धीरे झूल रे/लरजे जियरा पेंग न मारो रसरिया सरके रै सैंया....।


ठुमरी अंग में कजरी से वह घटाओं की बारिश कराती हैं- बरसन लागी बदरिया कारी/प्यारे बिन लागे ना मोरी अंखियां...। शिवानी बताती है कि जब सवान की काली घटा बरसने लगती है और तब नायिका को प्रियतम के बिना नींद नहीं आती।

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