Varanasi: सर्व सेवा संघ अभी नहीं होगा ध्वस्त, हाईकोर्ट ने कार्रवाई न करने का दिया आदेश, अब तीन जुलाई को सुनवाई
वाराणसी के राजघाट स्थित सर्व सेवा संघ को ध्वस्त करने के विरोध में सड़क से सोशल मीडिया तक संघर्ष जारी है। इस बीच शुक्रवार को ईलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्व सेवा संघ पर कार्रवाई पर रोक लगा दी है। मामले को लेकर अब हाईकोर्ट में तीन जुलाई को सुनवाई होगी।
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वाराणसी के राजघाट स्थित सर्व सेवा संघ अभी ध्वस्त नहीं होगा। ध्वस्तीकरण के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन जुलाई तक रोक लगा दी है। रेलवे प्रशासन ने 30 जून को सर्व सेवा संघ साधना केंद्र को गिराने के लिए नोटिस दिया था। इस मामले में सर्व सेवा संघ ने 28 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई की अगली तारीख तीन जुलाई की तय की है। साथ ही जिला प्रशासन को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। गांधी और जेपी की विरासत सर्व सेवा संघ के ध्वस्तीकरण के कारण सड़क से सोशल मीडिया तक संघर्ष हो रहा है।
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सर्व सेवा संघ भवन को ध्वस्त करने का जमकर हो रहा विरोध
प्रशासन की ओर से तय मियाद 30 जून यानि शुक्रवार को रेलवे का ध्वस्तीकरण दस्ता और बुलडोजर सर्व सेवा संघ के भवनों को गिराने नहीं पहुंचा। देश भर से पहुंचे लोगों ने शासन, प्रशासन और रेलवे प्रबंधन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। हालांकि, प्रदर्शन में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर नहीं पहुंच सकीं।
एक तरफ शुक्रवार सुबह बारिश हो रही थी तो दूसरी तरफ राजघाट के सर्वसेवा संघ परिसर में गतिविधियां तेज हो गईं। सुबह से ही लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। सर्व सेवा संघ भवन को ध्वस्त करने के विरोध में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, लोकतंत्र सेनानी और गांधीवादी प्रवेश द्वार पर ही धरने पर बैठ गए।
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लोकतंत्र सेनानी राम धीरज के नेतृत्व में सभी ने विरोध मार्च निकालकर नारेबाजी की। वक्ताओं ने कहा कि जमीन की रजिस्ट्री और डीड पेपर होने के बाद भी शासन और प्रशासन मनमानी कर रहे हैं। वह किसी भी कीमत पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण की विरासत को जमींदोज नहीं होने देंगे। शासन व प्रशासन के बुलडोजर का मुंह बापू के अहिंसा के हथियार से दिल्ली की ओर मोड़ देंगे।
देश के पहले राष्ट्रपति की अगुवाई में हुई थी स्थापना
सर्व सेवा संघ की स्थापना मार्च 1948 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई थी। विनोबा भावे के मार्गदर्शन में करीब 62 वर्ष पहले नींव रखी गई। इसका उद्देश्य महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार-प्रसार करना था। 1960 में इस जमीन पर गांधी विद्या संस्थान की स्थापना के प्रयास शुरू हुए। भवन का पहला हिस्सा 1961 में बना था। 1962 में जय प्रकाश नारायण यहां रहे थे।
2007 में विवाद के बाद लग गया था ताला
सर्व सेवा संघ के रामधीरज ने बताया कि रेलवे से 2007 में शुरू विवाद के बाद गांधी विद्या संस्थान पर ताला लग गया। कोर्ट ने मंडलायुक्त की अध्यक्षता में संचालक मंडल बनाया। 2007 से 14 मई 2023 तक संस्थान पर जिला प्रशासन का ताला बंद रहा। सर्व सेवा संघ की ओर से लिखित रूप से निवेदन किया गया कि संस्थान की लाइब्रेरी अमूल्य है, किताबें नष्ट हो रही हैं। इसकी जिम्मेदारी सर्व सेवा संघ को दे दी जाए। बावजूद प्रशासन ने इसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को सौंप दिया।