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काशी का दूसरा 'गोल्डन टेंपल': संत रविदास का दरबार और बना भव्य, मंदिर का प्रवेश द्वार हुआ स्वर्ण मंडित

Fri, 18 Aug 2023 08:51 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Fri, 18 Aug 2023 08:51 PM IST
सार

श्रम साधक संत रविदास की जन्मस्थली वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में संत रविदास मंदिर है। इस मंदिर की भव्यता अब और बढ़ गई है। मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार स्वर्ण मंडित हो गया है। 

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Saint Ravidas mandir of varanasi became more grand entrance of temple covered with gold
संत रविदास मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगा सोना - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मंदिरों के शहर बनारस में जहां भगवान के मंदिर हैं तो वहीं उनके भक्तों के भी अनोखे मंदिर हैं। सीरगोवर्धन में संत रविदास की श्रम साधना ऐसी फलीभूत हुई कि वह श्रद्धालुओं के लिए स्वयं भगवान के रूप में पूजे जाते हैं। श्रद्धालुओं की श्रद्धा ऐसी है कि उन्होंने अपने दान से गुरु की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर बनाया और यह श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के बाद काशी का दूसरा स्वर्ण मंदिर बन गया।

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इस मंदिर की भव्यता अब और बढ़ गई है। मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार स्वर्ण मंडित हो गया है। चौखट और दरवाजे पर सोने की परत चढ़ाई गई है। मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि भक्तों ने मिलकर मुख्य द्वार को स्वर्णमंडित कराया है। सोना चढ़ाने का काम दरवाजे पर पिछले सप्ताह से चल रहा था।

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मंदिर में 130 किलो सोने की पालकी

वाराणसी के सीरगोवर्धन स्थित संत रविदास का मंदिर रैदासियों की आस्था का केंद्र है। यहां प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक हाजिरी लगा चुके हैं। मंदिर के शिखर का कलश और मंदिर में मौजूद संत रविदास की पालकी से लेकर छत्र तक सब कुछ सोने का है। श्रद्धालुओं के दान से संत के मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराया गया है। संत रविदास मंदिर में 130 किलो सोने की पालकी रखी हुई है।

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Saint Ravidas mandir of varanasi became more grand entrance of temple covered with gold
सीर गोवर्धन में संत रविदास मंदिर - फोटो : अमर उजाला

इसे 2008 में यूरोप के भक्तों ने संगत कर पंजाब के जालंधर में बनवाया था।  इसका अनावरण बसपा सुप्रीमो मायावती ने फरवरी 2008 में किया था। इस पालकी को साल में एक बार जयंती के दिन निकाला जाता है। इस मंदिर का निर्माण 1965 में हुआ था। यहां पहला स्वर्ण कलश 1994 में संत गरीब दास ने संगत के सहयोग से चढ़ाया था। बाद में भक्तों ने इसे 32 स्वर्ण कलशों से सुशोभित किया।

इसके अलावा 2012 में 35 किलो का सोने का स्वर्ण दीपक बनवाया गया। इसमें अखंड ज्योति जल रही है। इस दीपक में एक बार में पांच किलोग्राम घी भरा जाता है। इतना ही नहीं एक भक्त ने संगत कर मंदिर में 35 किलो सोने का छत्र भी लगाया है। कुल मिलाकर इस पूरे मंदिर में 200 किलो से ज्यादा सोना मौजूद है। जो हर साल भक्तों के दान से बढ़ता ही जा रहा है। 

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