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रोपवे : यात्रियों की सुरक्षा के लिए कैंट-रथयात्रा पर 5 और गिरजाघर पर 13 डिग्री तक झुकाया गया टावर

Tue, 12 Nov 2024 12:51 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 12 Nov 2024 12:51 AM IST
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Ropeway: For the safety of passengers, the tower was tilted by 5 degrees on Cantt-Rathayatra and 13 degrees on Church.
गंडोला की पुरानी तस्वीर- वाराणसी की
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रोपवे : यात्रियों की सुरक्षा के लिए कैंट-रथयात्रा पर 5 और गिरजाघर पर 13 डिग्री तक झुकाया गया टावर

गंडोला को संतुलित करने के लिए अपनायी जाती है यह तकनीक, प्रोजेक्ट मैनेजर ने कहा- स्विटजरलैंड में तो कुछ टावर 45 डिग्री तक झुके रहते हैं
माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी। कैंट रेलवे स्टेशन से गिरजाघर तक रोपवे के सभी टावर बन गए हैं। जल्द ही ट्रायल रन की प्रक्रिया शुरू होगी। गंडोला को संतुलित रखने और यात्रियों की सुरक्षा के लिए रोपवे के चार टावर को पांच डिग्री तक तो एक टावर को 13 डिग्री तक झुकाया गया है। यानी यात्रा के समय गंडोला झुकता हुआ आगे बढ़ेगा। इससे यात्री सुरक्षित रहेंगे।
टावर नंबर दो कैंट स्टेशन पर बनाया गया है। इसमें पांच डिग्री तक झुकाव है। इसी तरह रथयात्रा पर राहिल रेस्टोरेंट के पास बने टावर नंबर 16, रथयात्रा स्टेशन पर टावर नंबर 17 और थियोसॉफिकल सोसाइटी के पास स्थित टावर नंबर 20 पांच डिग्री तक झुकाए गए हैं। गिरजाघर के पास बने टॉवर नंबर 27 को 13 डिग्री तक झुकाया गया है। इस तकनीक के प्रयोग से रोपवे चलने के दौरान प्राकृतिक बलों, जैसे गुरुत्वाकर्षण और हवा के साथ बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलती है। इससे केबल और टावर को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।
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कार्यदायी संस्था नेशनल हाईवे लॉजिस्टिक मैनेजमेंट लिमिटेड की प्रोजेक्ट मैनेजर पूजा मिश्रा ने बताया कि रोपवे प्रणाली में झुके हुए टावर की आवश्यकता होती है। इससे रोपवे का संचालन बेहतर हो जाता है। टावर की संरचना के जरिये ही केबल से आने वाले भार को समान रूप से विभाजित कर दिया जाता है। इससे टावर सुरक्षित रहता है। उसकी स्थिरता में सुधार होता है। ऐसा करना पूरे सिस्टम को चलाने के लिए जरूरी है। टावर का झुकाव सिस्टम को कुशलतापूर्वक काम करने के लिए आवश्यक तनाव और कोण को बनाए रखने में मदद करता है। स्विटजरलैंड में कुछ रोपवे के निर्माण में तो कुछ टावर को 45 डिग्री तक झुकाया जाता है।
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प्रोजेक्ट मैनेजर ने बताया कि रोपवे के टावर तैयार करते समय कई तकनीकी पक्ष देखे जाते हैं। इसमें केबल का तनाव, फैलाव की लंबाई (टावरों के बीच की दूरी), निकासी की आवश्यकता शामिल है। यह भी देखा जाता है कि जहां टावर बनना है, वहां जमीन की मिट्टी कैसी है। जमीन की सतह से कितना नीचे पानी मिल रहा है। जलभराव की स्थिति कैसी है। इसके अलावा, भार (केबिन/यात्री/सामग्री), पर्यावरणीय पक्ष (हवा, बर्फ, आदि)। इन सभी स्थितियों का ठीक से परीक्षण करने के बाद ही टावर तैयार किए जाते हैं।
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