खुलासा: 167 साल पुराने अजनाला के 282 शहीदों के परिजनों को नहीं मिला न्याय, संपर्क करने पर ASI ने बनाया मजाक
बीएचयू के इनबिक्स एडनेट का समापन पर खोजकर्ता सुरेंदर कोचर ने बताया कि 167 साल पुराने अजनाला के 282 शहीदों के परिजनों को न्याय नहीं मिला। कहा कि संपर्क करने पर एएसआई ने भी मजाक बनाया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बीएचयू में तीन दिन तक चले जेनेटिक कुंभ ''इनबिक्स एडनेट'' के समापन पर अमृतसर के अजनाला में शहीद हुए 282 सैनिकों का मुद्दा गूंजा। इन सैनिकों के कंकाल को खोजने वाले लेखक सुरेंदर कोचर ने कहा कि 1857 की क्रांति के दौरान अमृतसर के गांव अजनाला में 282 सैनिकों को अंग्रेजों ने गोलियों और पत्थरों से मारकर फेंक दिया था। 167 साल बीत गए, फिर भी शहीदों के परिजनों को न्याय नहीं मिल सका।
बीएचयू के सेमिनार हॉल में सुरेंदर कोचर ने कहा कि अजनाला के इतिहास की खोज में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों ने कोई सहयोग नहीं किया। कई बार संपर्क करने पर सिर्फ मजाक और उपेक्षा का ही सामना करना पड़ा। लेकिन, भारतीय सेना ने शहीद सैनिकों की हड्डियों की खोज के लिए खोदाई में मदद की थी।
उन्होंने कहा कि अजनाला के शहीदों का इतिहास अब भी अनकहा है। उनकी वीरता को उचित सम्मान नहीं मिल सका। कुएं में पड़े नर कंकाल ब्रिटिश काल के भारतीय शहीदों की कहानी को बयां करते हैं, जो एक काले अध्याय के रूप में हमारे इतिहास में दर्ज है।
कोचर ने खुलासा किया कि इस खोज का पहला सुराग उन्हें ब्रिटिश अधिकारी और क्राइसेस ऑफ द पंजाब पुस्तक के लेखक कूपर से मिला था। इसके बाद मेजर स्पेंसर के हत्यारे, प्रकाश पांडेय के खिलाफ उस समय की एफआईआर ने उन्हें एक और अहम सुराग दिया।
जलियांवाला बाग की तरह माना जाए प्रतीक
कोचर ने कहा कि अजनाला के काले कुएं की खोज ने 167 साल पुरानी गाथा को उजागर किया, जिसे जलियांवाला बाग हत्याकांड की तरह ब्रिटिश साम्राज्य के अत्याचारों का प्रतीक माना जा सकता है। शुरुआत में गुरुद्वारों और स्थानीय लोगों से भी सहयोग नहीं मिला। अंग्रेजों ने मारकर ही नहीं बल्कि 69 सैनिकों को तो जिंदा ही कुएं में फेंकवा दिया था।
पीएमओ को भेजा गया था लेटर
बीएचयू में अजनाला से जुड़े वैज्ञानिकों ने बताया कि पीएमओ को भी लेटर भेजा गया था। वहां से इसे एएसआई को भेज दिया गया। लेकिन, वहां से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। कार्यक्रम के आयोजक बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि शहीद सैनिकों का उनके धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार कराया जाना है। क्योंकि, इनकी मौत अंग्रेजों से संग्राम के दौरान हुई थी, इसलिए इनका रीति रिवाज के साथ अंत्येष्टि जरूरी है। इन सभी सैनिकों की डिटेल ब्रिटिश सरकार के पास है, जिसे भारत लाया जाना चाहिए। इसी के आधार पर उन शहीदों के वंशजों की खोज की जा सकती है।