Research in BHU : निकोबार द्वीप पर 5000 साल पहले पहुंचे इंसान, जीन वैज्ञानिकों ने दी अहम जानकारी
Varanasi News : यह शोध दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में आनुवंशिक विविधता के समृद्ध ताने-बाने को समझने के लिए नए रास्ते खोलता है और निकोबार आबादी की सांस्कृतिक और आनुवंशिक विरासत को संरक्षित करने के महत्व को समझाता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आज से 5000 साल पहले निकोबार द्वीप समूह पर इंसानों की बसावट हुई। कार निकोबार और ग्रेट निकोबार सहित सात बड़े द्वीप से बने निकोबार के मूल निवासियों की अनुमानित संख्या लगभग 25,000 है।
बीएचयू समेत देश भर के 12 वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक अध्ययन से निकोबार के लोगों की आनुवंशिक उत्पत्ति के बारे में जानकारी इकट्ठा की है। यह आनुवंशिक विश्लेषण में बीएचयू से प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और सीएसआईआर-सीसीएमबी, हैदराबाद के डॉ. के. थंगराज की टीम ने इस खोज में 5 लाख से ज्यादा डीएनए मार्करों का उपयोग करके किया है। ये डीएनए मार्कर्स एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में माता-पिता से विरासत में मिलते हैं।
शोधकर्ताओं ने एशिया के 1,559 व्यक्तियों का डीएनए विश्लेषण दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई आबादी के साथ निकोबार के लोगों की वंशावली और आनुवंशिक समानता का पता लगाने के लिए किया। यह अग्रणी अध्ययन हाल ही में विज्ञान की अग्रणी पत्रिका यूरोपियन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुई हैं।
'भाषाविद वैज्ञानिको ने सिद्धांत दिया था कि निकोबारी जनजातियो के पूर्वज होलोसीन (लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व) के समय निकोबार द्वीपसमूह में पहुंचे। जबकि डीएनए के आधार मॉलिक्यूलर क्लॉक का इस्तेमाल करते हुए हम लोग बेहतर तरीके से निकोबारी जनजातियों के आगमन समय को बता सके जो आज से 5000 वर्ष पूर्व रहा' यह बात टीम के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. थंगराज ने कही।
अध्ययन में कई जानकारियां आईं सामने
इस अध्ययन ने विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली तिन-माल नामक जनजाति के डीएनए की समानता निकोबार के लोगो से सबसे ज्यादा बतायी। इस अध्ययन ने दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाली जनजाति तिन-माल की विशिष्ट आनुवंशिक पहचान उजागर किया, जो दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे पुरानी भाषा ऑस्ट्रोएशियाटिक बोलती हैं। इस समुदाय ने समय के साथ निकोबार जनजातियों के साथ उल्लेखनीय अनुवांशिक विशिष्टता बनाए रखी है, जो इनकी भाषा में भी परिलक्षित होता है यह बात टीम के भाषा वैज्ञानिक डॉ जॉर्ज वैन द्रिएम ने कही।
प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि यह महत्वपूर्ण शोध दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे प्राचीन ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा और उसके दक्षिण एशिया के साथ निकोबार में अनुवांशिक प्रसार की समयावधि का सटीक विश्लेषण करता है। साथ ही एक आश्चर्य जनक बात और निकल कर आती है की निकोबारी जनजाति प्राचीन ऑस्ट्रोएशियाटिक के जीनपूल को अभी भी संरक्षित किए हुए है।
बीएचयू आर्कियोलोजी के डॉ. सचिन तिवारी ने कहा की दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच आर्कियोलोजी द्वारा खोजे गए लिंक को डीएनए शोध भी प्रमाणित करता है
इस शोध टीम के अन्य सदस्य बीएचयू से डॉ. राहुल मिश्र, डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह, शैलेश देसाई, प्रतीक पाण्डेय, बीएसआईपी लखनऊ से डॉ. नीरज राय, कलकत्ता यूनिवर्सिटी से डॉ. राकेश तमांग और अमृता विश्वविद्यापीथम से डॉ. प्रशांत सुरावझाला थे।