रामलीला: धर्म और पश्चाताप का पाठ पढ़ा रहे जेल के 30 बंदी, सेंट्रल जेल में सजायाफ्ता बंदी बने राम; कल से रंगमंच
वाराणसी सेंट्रल जेल में 30 सजायाफ्ता बंदी रामलीला के मंचन के जरिये मर्यादा, धर्म और पश्चाताप का संदेश देंगे। बंदी भगवान राम, लक्ष्मण और रावण समेत विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाएंगे। जेल परिसर में कल से 10 दिवसीय रामलीला शुरू होगी। आयोजन का उद्देश्य बंदियों में नैतिक मूल्यों, आत्मचिंतन और सकारात्मक बदलाव की भावना विकसित करना है।
विस्तार
कभी संगीन जुर्म की राह पर चलकर सलाखों के पीछे पहुंचे बंदी अब मंच पर मर्यादा, धर्म और पश्चाताप का पाठ पढ़ा रहे हैं। शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में बंद कुल 2,149 कैदियों में से 30 सजायाफ्ता बंदी पश्चाताप के संकल्प के साथ ऐतिहासिक रामलीला के प्रमुख पात्रों को जीवंत कर रहे हैं। 11 अक्तूबर से 20 अक्तूबर तक चलने वाली इस 10 दिवसीय रामलीला के लिए जेल परिसर में रंगमंच सज चुका है। अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रकार के आयोजनों से बंदियों के जीवन में सुधार होता है।
जौनपुर के पंकज मौर्य राम की भूमिका निभा रहे हैं। किरदार निभाते समय वह ईश्वर से दोबारा किसी अपराध में शामिल न होने की प्रार्थना करते हैं। वह हत्या के मामले में सजायाफ्ता हैं। भदोही के रहने वाले नरेंद्र प्रताप सिंह रामलीला में परशुराम और भरत की भूमिका निभा रहे हैं। वह पिछले सात वर्षों से रामलीला में भाग ले रहे हैं। वह हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। बलिया के हर्ष कुमार सिंह लक्ष्मण की भूमिका निभा रहे हैं। गाजीपुर के मासूम रजा राही चार साल से हत्या के मामले में सजा काट रहे हैं। वह पेशे से वकील थे।
गाजीपुर के अशरफ शत्रुघ्न और माता अनसूया की भूमिका निभा रहे हैं। श्रीराम के छोटे भाई का किरदार निभाकर उनका जीवन परिवर्तित हो चुका है। भदोही के प्रदीप कुमार मां सीता का किरदार निभा रहे हैं। सोनभद्र के चिंतामणि चौबे रावण और दशरथ का किरदार निभा रहे हैं। वह हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। भारी-भरकम व्यक्तित्व और आवाज के कारण वह रावण के किरदार में जान फूंक देते हैं। गोरखपुर के रंजीत यादव हनुमान की भूमिका निभा रहे हैं।
महीनों की साधना से बदला कैदियों का स्वभाव
वरिष्ठ जेल अधीक्षक राधा कृष्ण मिश्रा बताते हैं कि इस वर्ष रामलीला में अभिनय करने वाले लगभग 80 प्रतिशत बंदी पहली बार मंच पर उतर रहे हैं। इन पात्रों की तैयारी बीते ढाई से तीन महीनों से चल रही है। संवाद अदायगी, चौपाइयों के उच्चारण और सात्विक दिनचर्या के कारण बंदियों के आचार-विचार, बोलचाल और आपसी व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखा गया है। जो कैदी पहले अवसाद या गुस्से में रहते थे, वे अब विनम्रता से पेश आ रहे हैं। इस बदलाव के कारण बैरकों में अन्य कैदियों के बीच भी इनके प्रति सम्मान बढ़ गया है।