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तुलसीघाट की रामलीला में वनगमन और निषाद मिलन का हुआ मंचन

Sat, 17 Oct 2020 01:45 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 17 Oct 2020 01:45 AM IST
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ramleela in varanasi
राम को चौदह वर्ष का वनवास और भरत को राज्य का वरदान कैकेयी ने मांगा तो दशरथ के होश उड़ गए। उनकी खुशियों पर मानों वज्रपात हो गया। भगवान राम ने जैसे ही वन के लिए प्रस्थान किए तो लीलाप्रेमियों की आंखों से आंसू छलक पड़े। तुलसीघाट की रामलीला के तीसरे दिन वनगमन और निषाद मिलन की लीला का मंचन हुआ।
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शुक्रवार को लीला मंचन के दृश्य में विचारमग्न सीता को देख भगवान राम कहते हैं कि यह समय सोचने का नहीं है। शीघ्र वन चलने की तैयारी करो। सीता अपनी सास कौशल्या का पैर पकड़कर कहती हैं कि मैं बहुत ही अभागन हूं। जब सेवा करने का मौका आया तब वन जाना पड़ रहा है। कौशल्या ने सीता को आशीर्वाद दिया। उधर, राम के वन जाने की खबर सुनकर लक्ष्मण आते हैं और वह भी पिता दशरथ से वन जाने की आज्ञा मांगते हैं। दशरथ जी सीता से कहते हैं कि वन में तुम्हें बहुत कष्ट होगा। तुम वहां कैसे रहोगी। सीता संकोचवश कोई उत्तर नहीं दे पातीं। इतने में कैकेयी तिलमिलाती हुई आती हैं और मुनियों का वस्त्र राम के आगे रख देती हैं। कैकेयी राम से कहती हैं कि तुम राजा के प्राण हो तुम्हारा शील और स्नेह छोड़ने से वो डरते हैं। कैकेयी की यह बात राजा दशरथ को बाण की तरह लगती है। राम वशिष्ठ के पास पहुंचकर सबको विकल देख समझाते हैं। कहते हैं कि सब लोग महाराज की सेवा करते रहिएए हम शीघ्र आएंगे। राम वन की ओर निकल पड़ते हैं। सुमंत रथ लेकर राम को बैठाने के लिए जाते हैं लेकिन सबको वापस होना पड़ता है। राम के बिना अयोध्या सूनी हो जाती है। भगवान की पहली रात तमसा नदी के किनारे कटती है। सुबह होने पर राम, सीता और लक्ष्मण शृंगवेरपुर पहुंच जाते हैं जहां पर निषाद से मिलन होता है। स्वरूपों की आरती महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने उतारी।
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राम को मनाने पहुंचे भरत
श्री चित्रकूट रामलीला के आठवें दिन भरत जी भगवान राम को मनाने पहुंचे। दोनों भाईयों के मिलन को देखकर सभी की आंखें सजल हो उठीं। राम को देखते ही भरत उनके चरणों में गिर पड़े। भगवान राम ने भरत को उठाकर हृदय से लगाया। पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर भगवान राम दुखी होते हैं। महर्षि वाल्मिकी उन्हें शोक ना करने का उपदेश देते हैं। स्वरूपों की आरती पं. मुकुंद उपाध्याय ने उतारी।
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