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राष्ट्रभाषा हिंदी का दीक्षा मंत्र दिया था पं. गिरिधर शर्मा नवरत्न ने

Sun, 06 Jun 2021 01:24 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 06 Jun 2021 01:24 AM IST
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Pt. Giridhar Sharma Navratna had given the initiation mantra of the national language Hindi.
पं. गिरिधर शर्मा नवरत्न हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग के स्वनामधन्य व्यक्तित्व थे। वह न केवल एक साहित्यकार थे अपितु सफल अनुवाद और हिंदी के उत्थान में स्वयं को होम करने वाले सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। छह जून को उनकी जयंती मनाई जाएगी।
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साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने बताया कि गिरिधर जी ने शुरुआत में घर पर ही हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत, फारसी आदि भाषाओं की शिक्षा के बाद जयपुर से प्रश्नवर कान्ह जी व्यास तथा परम वेदज्ञ द्रविड़ वीरेश्वर शास्त्री से संस्कृत, काव्य तथा संस्कृत व्याकरण का ज्ञान लिया। इसके बाद वह आगे की शिक्षा के लिए काशी आए। काशी में पंडित गंगाधर शास्त्री से संस्कृत साहित्य तथा दर्शन का विशिष्ट अध्ययन किया।
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पं. नवरत्न ने अपने जीवन में मुट्ठी भर लोगों के लिये नहीं लिखा, अपितु हजारों हजार लोगों के लिए साहित्य रचा। इसमें हजारों देशवासियों के सपने समाहित थे। इसलिये उनका सृजन हिंदी भारती के लिए मर मिटने वाले भावों को जागृत करता है। उन्होंने गुलाम भारत की दुर्दशा देख यह समझा था कि देश को परतंत्रता से उबारने में हिंदी और देशभक्ति के भाव होना आवश्यक है। उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी का दीक्षा मंत्र दिया था जिसके परिणाम स्वरूप लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में देश की राष्ट्रभाषा हिंदी घोषित कर दी गई। उन्होंने अपने लेखन में समाज और राष्ट्र की कई चेतनाओं को मन से छुआ।
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उन्होंने 1915 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में ऐसी सुंदर और मौलिक भारत माता की वंदना प्रस्तुत की थी, जिसे हिंदी साहित्य का प्रथम राष्ट्रगीत माना गया था। परन्तु 1920 ई. में उन्होंने जिस भावभरे भारत के राष्ट्रीयगान की रचना की थी उसके बारे में आज तक कोई इसलिये नहीं जान पाया कि वह रचना केवल हस्तलिखित ही रह गई। सन 1912 ई. में गिरिधर शर्मा ने झालरापाटन में श्री राजपूताना हिंदी साहित्य सभा की स्थापना की जिसके संरक्षक झालावाड़ नरेश भवानी सिंह बने। इस सभा का उद्देश्य हिंदी-भाषा की हर तरह से उन्नति करना और हिंदी भाषा में व्यापार वाणिज्य, कला कौशल, इतिहास विज्ञान वैद्यक, अर्थशास्त्र, समाज, राजनीति, पुरातत्व, साहित्य उपन्यास आदि विविध विषयों पर अच्छे ग्रंथ तैयार करना और सस्ते मूल्य पर बेचना था।
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