'वेंटिलेटर नहीं है' कहकर लौटाते रहे निजी अस्पताल, चली गई बीएचयू के पूर्व कुलसचिव के बेटे की जान
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स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर दावे भले ही कितने किए जा रहे हों, लेकिन मरीब अब भी परेशान हो रहे हैं। रविवार को ‘वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है’ कहकर लौटाए जाते रहे बीएचयू के पूर्व कुलसचिव के बेटे विजय भट्टाचार्य की जान चली गई।
राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन में अधिकारी रहे दुर्गाकुंड निवासी 45 वर्षीय विजय भट्टाचार्य की तबीयत खराब होने पर रविवार को परिवार के लोग उन्हें सबसे पहले रविंद्रपुरी स्थित एक हॉस्पिटल लेकर गए। जहां अस्पताल प्रबंधन ने वेंटीलेटर न होने की बात कहकर वापस कर दिया। उनका आक्सीजन मास्क भी हटा दिया गया।
विजय भट्टाचार्य की बहन डॉ. मधुमिता ने बताया कि रविंद्रपुरी के बाद भिखारीपुर स्थित एक अस्पताल में अपने भाई को लेकर गईं, वहां भी डॉक्टरों ने वेंटिलेटर न होने की बात कह कर लौटा दिया। कई अस्पतालों का चक्कर काटने के बाद बीएचयू अस्पताल की इमरजेंसी ले गए, वहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व न्यास अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि विजय भट्टाचार्य के परदादा महामहोपाध्याय पंडित मनमथनाथ भट्टाचार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भिन्न मित्रों में थे। विजय के दादा महामहोपाध्याय पं. महेशचंद्र न्यायरत्न और पिता बीएचयू के कुलसचिव दुर्गा प्रसाद भट्टाचार्य थे।
विजय राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन में अधिकारी थे और पिता के निधन के बाद वह नौकरी छोड़कर वाराणसी आ गए। यहां पर उन्होंने अपना निजी व्यवसाय शुरू कर दिया था। अपने पीछे वह अपनी दो बहनों को छोड़ गए हैं।
निजी अस्पतालों में इस तरह की लापरवाही गंभीर है। कोरोना काल में सभी मरीजों का हर संभव इलाज करने का निर्देश पहले ही दिया जा चुका है। लापरवाही बरतने वाले असपतालों पर कार्रवाई होगी।
डॉ. वीबी सिंह, सीएमओ
राखी बांधने वाले हाथों ने दी भाई को मुखाग्नि
जिन हाथों से कभी भाई की कलाई पर राखी बांधी थी, उन्हीं हाथों ने जब भाई की चिता को मुखाग्नि दी तो आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। हरिश्चंद्र घाट पर मौजूद हर एक शख्स की आंखें भी नम हो उठीं। बीएचयू की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मधुमिता भट्टाचार्य ने जब अपने भाई विजय भट्टाचार्य की चिता को आग दी तो वह अपने आंसुओं को रोक नहीं सकीं।
छोटी बहन मालविक भट्टाचार्य ने उन्हें संभाला। विजय की रविवार की दोपहर मौत हो गई थी। परिवार में किसी पुरुष सदस्य के नहीं होने पर डॉ. मधुमिता ने ही अपने भाई को मुखाग्नि देने का निर्णय लिया। विजय आठ महीने से बीमार चल रहे थे।