वाराणसी में बोलीं प्रीति अदाणी: प्राचीन ज्ञान से मिल सकता है आधुनिक चुनौतियों का समाधान
वाराणसी में आयोजित विश्व संगोष्ठी में अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान की उपयोगिता पर जोर दिया। वहीं, प्रो. जेफ्री सैक्स ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका और एशिया-अफ्रीका की ओर आर्थिक शक्ति के बदलाव पर विचार रखे।
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अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा कि प्राचीन ज्ञान को वर्तमान की समस्याओं से जोड़कर उसका उपयोग लोगों का जीवन बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए। मानवीय पीड़ा, असमानता और संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसे व्यवहार में लाना जरूरी है। वह सोमवार को वाराणसी में 'आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान' विषय पर आयोजित विश्व संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान का महत्व केवल उसके पुराने होने में नहीं, बल्कि आज की समस्याओं के समाधान में उसकी उपयोगिता में है। ज्ञान दुनिया बदलने की शक्ति देता है, जबकि विवेक यह सुनिश्चित करता है कि बदलाव से दुनिया बेहतर बने।
वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा का किया उल्लेख
डॉ. अदाणी ने यूनानी दार्शनिक अरस्तू, भगवान बुद्ध और चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन सभी की विचारधाराओं में मानव कल्याण, नैतिक आचरण, जिम्मेदारी और सामाजिक सद्भाव को महत्व दिया गया है। ये विचार भारत की प्राचीन अवधारणा 'वसुधैव कुटुंबकम' यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, से भी जुड़ते हैं। उन्होंने सभ्यतागत ज्ञान का उपयोग लोगों का जीवन बेहतर बनाने और सतत विकास को आगे बढ़ाने में करने की बात कही।
समुदायों के विकास के क्षेत्र में तीन दशकों के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी प्रगति का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे लोगों के जीवन में कितना बदलाव आया है। समाज की सेवा का अर्थ लोगों की जरूरतों और समस्याओं को समझना, उनकी बात सुनना और उन्हें अपना भविष्य बेहतर बनाने में सक्षम बनाना है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1996 में स्थापित अदाणी फाउंडेशन देश के 22 राज्यों के सात हजार गांवों में काम कर रहा है। अब तक इसके कार्यों से 1.3 करोड़ लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है।
भारत नॉलेज ग्राफ का भी किया जिक्र
डॉ. अदाणी ने भारत नॉलेज ग्राफ का उल्लेख करते हुए बताया कि अदाणी समूह ने इस पहल के लिए एक करोड़ अमेरिकी डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई है। इसका उद्देश्य भारत की प्राचीन सभ्यता और ज्ञान परंपरा से जुड़ी जानकारी को विभिन्न विषयों के शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए सुलभ बनाना है। इसके माध्यम से 14 शोधकर्ताओं को डॉक्टरेट की पढ़ाई में भी सहयोग दिया जा रहा है।
2050 तक वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 13.1 प्रतिशत होने का अनुमान
संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क के अध्यक्ष और कोलंबिया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक प्रो. जेफ्री डी. सैक्स ने 'द रिटर्न ऑफ अ मल्टीपोलर वर्ल्ड' विषय पर संबोधन दिया। उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलते शक्ति संतुलन और भारत की बढ़ती भूमिका पर चर्चा की।
उन्होंने बताया कि वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 5.2 प्रतिशत थी, जो 2026 में बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई है। अनुमान है कि यह हिस्सेदारी वर्ष 2050 तक 13.1 प्रतिशत और 2100 तक 15.1 प्रतिशत हो जाएगी। उनके अनुसार आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र एशिया और अफ्रीका की ओर बढ़ेगा। वहीं, वर्ष 2100 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका, कनाडा और यूरोप की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर 13.7 प्रतिशत रह सकती है।
प्रो. सैक्स ने सतत विकास के क्षेत्र में अदाणी समूह और अदाणी फाउंडेशन के कार्यों की सराहना की। उन्होंने भारत में बुनियादी ढांचे के विस्तार और आर्थिक विकास में अदाणी समूह की भूमिका का भी उल्लेख किया।
कारोबार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी
बातचीत के दौरान प्रो. सैक्स ने परिवार के नाम से संचालित कारोबार की जिम्मेदारियों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यवसायों के साथ उनकी विरासत भी जुड़ी होती है। इसलिए उनकी जिम्मेदारी केवल मुनाफा कमाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के प्रति योगदान पर भी ध्यान देना चाहिए।
प्राचीन ग्रंथों को समझने में मददगार होगी एआई तकनीक
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने भारतीय सभ्यता की ज्ञान परंपरा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में तकनीक की भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) प्राचीन ग्रंथों को समझने और उनमें छिपे ज्ञान को सामने लाने में मदद कर सकता है। इससे भारत की सभ्यतागत ज्ञान परंपरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुलभ और प्रासंगिक बनाया जा सकेगा।
इससे पहले कोलंबिया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. निरुपम बाजपेयी ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। उन्होंने संगोष्ठी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं दीं। साथ ही विचारों और आध्यात्मिक परंपराओं के मिलन स्थल के रूप में वाराणसी की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला।
यह संगोष्ठी एक अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला का हिस्सा है। इसकी शुरुआत ग्रीस से हुई थी। वर्ष 2022 में एथेंस और 2023 में स्टागिरा में बैठकें हुई थीं। इसके बाद 2024 में चीन के कुफू और बीजिंग में भी इस श्रृंखला के तहत आयोजन किए गए।