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परंपरा: काशी में होगा कबूतरों की उड़ान का संग्राम, तीन घंटे हवा में टिके रहे तो विजेता; दी जाती है ट्रेनिंग

Thu, 22 Jan 2026 05:53 AM IST
अमन विश्वकर्मा राघवेंद्र पांडेय, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
राघवेंद्र पांडेय, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 22 Jan 2026 05:53 AM IST
सार

वाराणसी में इस परंपरा का आयोजन वर्षों से होता चला आ रहा है। छतों से कबूतरों को उड़ाया जाता है। आसमान में हजारों कबूतर उड़ते हैं। कबूतर उड़ाने वाले प्रतिभागियों के छतों पर एक-एक रेफरी मौजूद रहते हैं।

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pigeon flying competition in Varanasi in May winner one whose pigeon stays in air for three hours
काशी में होगा कबूतरों की उड़ान का संग्राम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: काशी में कबूतर उड़ाने की परंपरा आज भी जीवंत है। इस बार मई में कबूतरों की उड़ान का संग्राम होगा और आसमान उनका अखाड़ा बनेगा। इस संग्राम में कबूतरों का हवा में तीन घंटे टिके रहना जरूरी होता है। यहां ऊंचाई ही नहीं, बल्कि हवा में टिके रहने की क्षमता निर्णायक होती है।

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बनारस में हर साल होने वाली कबूतर उड़ाने की प्रतियोगिता न सिर्फ शौक बल्कि अनुशासन, धैर्य और कबूतर पालने वालों की मेहनत का प्रतीक है। इस प्रतियोगिता के दिन सुबह होते ही कबूतरबाजों की छतों पर चहल-पहल बढ़ जाती है और देखते ही देखते आसमान कबूतरों के लिए खुले अखाड़े में बदल जाता है। 
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प्रतियोगिता का आयोजन करने वाले अर्दली बाजार निवासी विक्की यादव ने बताया कि यह आयोजन हर साल फर्स्ट राउंड टूर्नामेंट कमेटी के बैनर तले मई और नवंबर माह के शुरुआती सप्ताह में होती है। इसमें अदर्ली बाजार, चौकाघाट, सिकरौल, बादशाह बाग, लल्लापुरा, बड़ी बाजार, राजघाट, भारद्वाजी टोला, छित्तनपुरा, पठानी टोला, अलईपुरा समेत कई इलाकों के कबूतर पालने वाले हिस्सा लेते हैं।

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सुबह 6 बजे से शुरू होती है प्रतियोगिता
विक्की ने बताया कि प्रतियोगिता के दिन सुबह ठीक छह बजे कबूतरों को छतों से एक साथ उड़ाया जाता है। शुरुआत के तीन घंटे सभी कबूतरों के लिए उड़ना अनिवार्य होता है। इसके बाद असली मुकाबला शुरू होता है। तीन घंटे पूरे होने के बाद जो कबूतर जितनी देर तक आसमान में बना रहता है, उसके आधार पर अंक तय किए जाते हैं और अंत में विजेता घोषित किया जाता है। कबूतर उड़ाने वाले प्रतिभागियों के छतों पर एक-एक रेफरी मौजूद रहते हैं। रेफरी कबूतरों के उड़ान भरने का समय और उनके लौटने का समय मिनट और सेकंड दर सेकंड दर्ज करते हैं।

आठ महीने की मेहनत से तैयार होते हैं कबूतर
इस खेल में हिस्सा लेने वाले कबूतरों को 6 से 8 महीने तक नियमित ट्रेनिंग दी जाती है। भारद्वाजी टोला निवासी कबूतर पालने वाले रवि यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले कबूतरों में मुख्य रूप से बनारसी नप्ता, घाघरा, कागदी और कासनी प्रजाति के कबूतर होते हैं। 

ट्रेनिंग के दौरान शुरुआत में उड़ान का समय कम रखा जाता है। फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाया जाता है। कबूतरों की सहनशक्ति, दिशा पहचानने की क्षमता और वापसी की आदत पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मौसम और हवा की दिशा इस प्रतियोगिता में अहम भूमिका निभाती है। उन्हें बाजरा, ज्वार, मक्का, मसूर, सूरजमुखी के बीज और कुसुम के बीज खिलाए जाते हैं।

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