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बनारस में विराजते हैं पाकिस्तानी महादेव, हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के समय की बताता है कहानी
Mon, 31 May 2021 01:38 PM IST
गीतार्जुन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: गीतार्जुन गौतम
Updated Mon, 31 May 2021 01:38 PM IST
सार
इस शिवलिंग की हर दिन पूजा होती है। सरकारी दस्तावेजों में आज भी पाकिस्तानी महादेव के नाम से मंदिर का नाम दर्ज है।
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पाकिस्तानी महादेव शिवलिंग।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
काशी बोलते ही लोगों की जुबान पर महादेव का नाम आ जाता है। यहां के घाटों और संकरी गलियों में प्राचीन काल से ही तमाम शिवलिंगों की स्थापना की गई है। जो आज भी लोगों के लिए आस्था के केंद्र बने हुए हैं। मछोदरी इलाके से कुछ दूर शीतला घाट पर ऐसे ही एक शिवलिंग की चर्चा लोगों में कौतूहल पैदा करती है। इसे लोग पाकिस्तानी महादेव के नाम से जानते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार सरकारी दस्तावेजों में भी इस मंदिर का नाम पाकिस्तानी महादेव के नाम से दर्ज है। अब सवाल यह उठता है कि इस मंदिर का नाम पाकिस्तान से क्यों जोड़ा जाता है।
यह बात सन 1947 हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के समय की है। उन दिनों देश में हालात कुछ ठीक नहीं थे। पूरा देश दंगों की आग में जल रहा था। इसी दौरान बंगाल में भी दंगा भड़कने से वहां के लोग देश के अन्य हिस्सों में पलायन को मजबूर हो गए। इनमें से एक जानकी बाई बोगड़ा का परिवार भी जो पहले काशी के ही रहने वाले थे। पश्चिम बंगाल से पलायन कर फिर से यहां आ गए।
बंगाल में जहां इनका परिवार रहता था, उन्होंने वहीं एक शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसे पलायन के समय काशी ले आए। परिवार के साथ जब ये मछोदरी स्थित शीतला घाट किनारे गंगा में शिवलिंग का विशर्जन करने लगे तो वहां के कुछ पुरोहितों ने उन्हें विशर्जन करने से रोका और मंदिर की स्थापना कराई। बंटवारे के दौरान पश्चिम बंगाल से लाए गए इस शिवलिंग का लोगों ने नाम भी पाकिस्तानी महादेव रख दिया। जिसे आज भी इसी नाम से पूजा जाता है।
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यह बात सन 1947 हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के समय की है। उन दिनों देश में हालात कुछ ठीक नहीं थे। पूरा देश दंगों की आग में जल रहा था। इसी दौरान बंगाल में भी दंगा भड़कने से वहां के लोग देश के अन्य हिस्सों में पलायन को मजबूर हो गए। इनमें से एक जानकी बाई बोगड़ा का परिवार भी जो पहले काशी के ही रहने वाले थे। पश्चिम बंगाल से पलायन कर फिर से यहां आ गए।
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बंगाल में जहां इनका परिवार रहता था, उन्होंने वहीं एक शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसे पलायन के समय काशी ले आए। परिवार के साथ जब ये मछोदरी स्थित शीतला घाट किनारे गंगा में शिवलिंग का विशर्जन करने लगे तो वहां के कुछ पुरोहितों ने उन्हें विशर्जन करने से रोका और मंदिर की स्थापना कराई। बंटवारे के दौरान पश्चिम बंगाल से लाए गए इस शिवलिंग का लोगों ने नाम भी पाकिस्तानी महादेव रख दिया। जिसे आज भी इसी नाम से पूजा जाता है।
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मंदिर के पुजारी अजय कुमार शर्मा ने बताया कि इस मंदिर की स्थापना के लिए बूंदी स्टेट के अखाड़ा परिषद द्वारा स्थान दिया गया था। जिसे रघुनाथ व मुन्नू महाराज के सहयोग से स्थापित कराया गया। बाद में कई लोगों द्वारा मंदिर की पूजा का दायित्व लिया। 2008 से हम यहां पूजा अर्चना करते हैं। हमारी अनुपस्थिति में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा नियमित पूजा की जाती है।