काशी में जिंदा हुई प्राचीन समय की शस्त्रार्थ परंपरा, संपूर्णानंद विश्वविद्यालय हुआ आयोजन
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का शताब्दी भवन उस समय वेद और शास्त्र की ऋचाओं से गूंज उठा जब, देश-विदेश के मूर्धन्य विद्वान शास्त्रार्थ करने लगे। शाम तक चले इस आयोजन से पूरा परिसर गुरुकुल और प्राचीन समय की शस्त्रार्थ परंपरा को एक बार फिर से जीवित कर दिया।
विश्वविद्यालय के शताब्दी भवन में ब्रम्हश्री विश्वनाथ गोपाल कृष्ण शास्त्री की अध्यक्षता में शास्त्रार्थ महाकुंभ का शुभारंभ हुआ। सम्मेलन के पहले दिन नेपाल, वर्मा, भूटान आदि देशों के विद्वान काशी सहित दक्षिण भारतीय पंडितों ने विभिन्न विषयों पर अपना-अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए एक-दूसरे को चुनौती दे रहे थे। व्याकरण शास्त्र में दरभंगा से आए विद्वान गणेश्वर झा ने अपना पक्ष को रखा।
इनके सामने उपस्थित गोआ के आचार्य पं देवदत्त गोविंद पाटिल ने कुलगुरू श्री विद्या गुरुकुलम का पक्ष दिया और कहा कि शास्त्रार्थ कला एक प्राचीन कला है, जिसके माध्यम से विभिन्न गूढ़ समस्याओं का शास्त्र सम्मत समाधान किया जाता रहा है। कुलपति प्रो राजाराम शुक्ल ने कहा कि शास्त्रों में निहित शब्द लोकोपयोगी है जो कि शास्त्रार्थ के माध्यम से ही बाहर आएंगे।
कार्यक्रम में प्रो विशिष्ठ त्रिपाठी, डॉ नागराज पातुरी, प्रो रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो रामपूजन पांडेय, कृष्ण जोशी, भूटान के राजगुरू स्वामी विवेकानन्द सरस्वती, ब्रम्हश्री मणि शास्त्री द्रविण, हरिराम भट्ट, डॉ पवन शुक्ला, ज्ञानेन्द्र सापकोटा आदि लोग उपस्थित रहे।
अवच्छेदक और अवच्छिन्न शब्दों से गूंजा संपूर्णानंद :
शास्त्रार्थ के दौरान अवच्छेदक और अवच्छिन्न शब्दों का सबसे अधिक प्रयोग दिखा। शास्त्रार्थ परंपरा में माना गया है कि एक शब्द से जोड़ना और एक से अलग करना होता है। ऐसे में इन दोनों शब्दों का शास्त्रार्थ में सबसे अधिक बार सुनने को मिला। विद्वानों ने इन दोनों शब्दों को शास्त्रार्थ की रीढ़ बताई।