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जन्मदिन विशेषः किसी भी सरकार की व्यवस्था से खुश नहीं हुए जनकवि 'धूमिल'
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Thu, 09 Nov 2017 05:25 PM IST
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जनकवि धूमिल
- फोटो : file photo
एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा आदमी रोटी खाता है, तीसरा आदमी है जो न रोटी बेलता है और न ही रोटी खाता है बल्कि रोटी के साथ खेलता है, मैं पूछता हूं कि यह तीसरा आदमी कौन है मेरे देश की संसद मौन है। देश में आजादी मिलने के बाद किसी भी सरकार की व्यवस्था से धूमिल कभी खुश नहीं हुए।
समकालीन युग के पुरोधा माने जाने वाले जनकवि धूमिल अपनी कविताओं में आम भाषा का प्रयोग करते थे। सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद कर व्यवस्था परिवर्तन करने का जज्बा इतना मजबूत था कि लोग उनकी जमात में खड़े होते चले गए।
वाराणसी के खेवली गांव निवासी देवी शंकर सिंह, उमाकांत पांडेय, दीनानाथ पांडेय और दूधनाथ सिंह ने बताया कि सुदामा पांडेय धूमिल अमीरी और गरीबी के बीच बनी खाई को पाटकर सबको बराबर देखना चाहते थे। वह सत्ता में बैठे हुक्मरानों की नाइंसाफी फरमान से आहत रहते थे।
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वह गरीबों के साथ हो रहे अन्याय को अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के पटल पर रखने का कार्य करते थे। उनकी तीखी-चुटीली और प्रखर वादी कविता से सत्ता की चूले हिल जाती थीं। इसी लिए वह सत्ताधरियों के निशाने पर रहते थे।
गांव के बेचन सिंह व राजनाथ सिंह ने बताया कि धूमिल निडर व निर्भीक जनकवि थे। वे कहते थे कि कुंठा और हताशा की हर लोग बात करते हैं। लेकिन उसके कारण की तलाश कोई नहीं करता। इसकी जड़ सिर्फ सत्ता में बैठे हुक्मरान हैं। सत्ता में जाने से पहले तमाम वादे करते हैं और सत्ता में पहुंचते ही सब कुछ भूल जाते हैं।
ऐसे लोगों को ही सुधारने के लिए जनकवि धूमिल ने अपनी प्रखर कविताओं के माध्यम से संघर्ष ताउम्र किया। इसी वजह से वह दुनिया के प्रख्यात कवि माने जाते हैं।
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समकालीन युग के पुरोधा माने जाने वाले जनकवि धूमिल अपनी कविताओं में आम भाषा का प्रयोग करते थे। सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद कर व्यवस्था परिवर्तन करने का जज्बा इतना मजबूत था कि लोग उनकी जमात में खड़े होते चले गए।
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वाराणसी के खेवली गांव निवासी देवी शंकर सिंह, उमाकांत पांडेय, दीनानाथ पांडेय और दूधनाथ सिंह ने बताया कि सुदामा पांडेय धूमिल अमीरी और गरीबी के बीच बनी खाई को पाटकर सबको बराबर देखना चाहते थे। वह सत्ता में बैठे हुक्मरानों की नाइंसाफी फरमान से आहत रहते थे।
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वह गरीबों के साथ हो रहे अन्याय को अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के पटल पर रखने का कार्य करते थे। उनकी तीखी-चुटीली और प्रखर वादी कविता से सत्ता की चूले हिल जाती थीं। इसी लिए वह सत्ताधरियों के निशाने पर रहते थे।
गांव के बेचन सिंह व राजनाथ सिंह ने बताया कि धूमिल निडर व निर्भीक जनकवि थे। वे कहते थे कि कुंठा और हताशा की हर लोग बात करते हैं। लेकिन उसके कारण की तलाश कोई नहीं करता। इसकी जड़ सिर्फ सत्ता में बैठे हुक्मरान हैं। सत्ता में जाने से पहले तमाम वादे करते हैं और सत्ता में पहुंचते ही सब कुछ भूल जाते हैं।
ऐसे लोगों को ही सुधारने के लिए जनकवि धूमिल ने अपनी प्रखर कविताओं के माध्यम से संघर्ष ताउम्र किया। इसी वजह से वह दुनिया के प्रख्यात कवि माने जाते हैं।
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धूमिल ने लड़ी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई
कविता
जनकवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की जयंती की पूर्व संध्या पर बुधवार को विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। खेवली गांव में समाजसेवी मनीष के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण के प्रति गांव के बच्चों को जागरूक किया साथ ही बच्चों को वृक्ष से होने वाले फायदे बताए। इसके साथ ही वृक्षों की रक्षा के लिए बच्चों को संकल्प दिलाया। ज्ञान-विज्ञान प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।
जंसा में आयोजित संगोष्ठी में लेडी डीएस एकेडमी स्कूल के उप प्रबंधक डा. कौशलेंद्र सिंह ने कहा कि धूमिल व्यवस्था परिवर्तन के पक्षधर थे। जो लोग उनकी कालजयी रचना संसद से सड़क तक अपने आप में काफी है।
धूमिल जनसहयोगी लोकतंत्र के लिए कविता एवं विचारों के माध्यम से जीवन पर्यंत लड़ते रहे। उन्होंने अपनी रचनाओं में इशारा किया है कि सारी समस्याओं की जड़ भारतीय संविधान है। जिसमें गांव, परिवार, जिला शब्द ही नहीं हैं।
जंसा में आयोजित संगोष्ठी में लेडी डीएस एकेडमी स्कूल के उप प्रबंधक डा. कौशलेंद्र सिंह ने कहा कि धूमिल व्यवस्था परिवर्तन के पक्षधर थे। जो लोग उनकी कालजयी रचना संसद से सड़क तक अपने आप में काफी है।
धूमिल जनसहयोगी लोकतंत्र के लिए कविता एवं विचारों के माध्यम से जीवन पर्यंत लड़ते रहे। उन्होंने अपनी रचनाओं में इशारा किया है कि सारी समस्याओं की जड़ भारतीय संविधान है। जिसमें गांव, परिवार, जिला शब्द ही नहीं हैं।