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बनारसी के नाम पर अब कहीं आैर की साड़ी नहीं

Thu, 23 Apr 2015 02:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी Updated Thu, 23 Apr 2015 02:06 AM IST
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Not so much in the name of Banarasi sari and a
देश-दुनिया में धाक जमा चुकी बनारसी साड़ियों के नाम पर आगे बनारस के बुनकर और कारोबारी ही उत्पाद बेच सकेंगे। इसके लिए क्षेत्रीय बुनकरों ने छह साल पहले मिले जीआई (भौगोलिक उपदर्शन) पेटेंट की ताकत का इस्तेमाल करने की ठानी है। इससे खरीददारों को असली और नकली बनारसी साड़ी का फर्क भी आसानी से समझ में आ जाएगा।
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बौद्धिक संपदा अधिनियम के तहत वर्ष 2009 में बनारसी साड़ियों और ब्रोकेड को जीआई पेटेंट हासिल हो गया। इसके बाद बनारसी साड़ी के ब्रांड का इस्तेमाल वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, चंदौली और भदोही को छोड़कर अन्य किसी जिले के बुनकर नहीं कर सकते, लेकिन पेटेंट मिलने के बाद भी सूरत, अहमदाबाद आदि जगहों पर बने वस्त्र बनारसी के नाम पर बिक रहे हैं। ईयूपीईए  हैंडलूम निदेशक, वाराणसी वस्त्रोद्योग संघ, ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन, बनारस बुनकर समिति, हैंडलूम फैब्रिक मार्केटिंग फेडरेशन आदि संगठनों ने 2011 में इसका लोगो भी पंजीकृत करा लिया, लेकिन अभी तक बुनकरों को इसका फायदा नहीं मिल पाया।
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ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के डा. रजनीकांत ने बताया कि महज 18 लोगों ने इसके लोगो के इस्तेमाल के लिए पंजीकरण लिया था। अब 75 अन्य बुनकरोें ने आवेदन किया है। इस क्रम में सरकार भी नए सिरे से बुनकरों का सर्वे करा रही है। प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत हर बुनकर का विवरण आनलाइन किया जाएगा। हैंडलूम के क्षेत्रीय  प्रबंधक अनिल सिंह का कहना है कि एक बार विवरण आनलाइन हो जाने के बाद क्रेता और  विक्रेता दोनों ही जान सकेंगे कि ट्रेडिंग असली बनारसी की हो रही है या नकली की। तब इस पेटेंट का पूरा फायदा असली कारीगरों को मिलने लगेगा। हैंडलूम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बनारस में 35 हजार घरों में हथकरघे लगे हैं, जिन पर 92 हजार बुनकर खालिस बनारसी हैंडलूम कपड़े तैयार करते हैं।
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