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UP: कैलाश सत्यार्थी बोले- बाल तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने की प्रेरणास्त्रोत रही काशी, पहला पड़ाव पूर्वांचल

Fri, 07 Mar 2025 05:29 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Fri, 07 Mar 2025 05:29 PM IST
सार

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने बताया कि 1982 से 1998 तक पूर्वांचल से करीब 30 हजार बच्चों को रेस्क्यू कराया गया। उन्होंने एआई पर कहा, उसके खतरों का मुकाबला करने के लिए सहानुभूतिपूर्ण बुद्धिमत्ता विकसित करने की आवश्यकता है। 

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Nobel Prize winner Kailash Satyarthi statement regarding campaign against child labor and child trafficking
नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि बालश्रम और बाल तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने की प्रेरणा काशी से ही मिली। पूर्वांचल इसका पहला पड़ाव रहा। उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि भदोही से इसकी शुरुआत की और 1982 से 1998 तक पूर्वांचल से करीब 30 हजार बच्चों को रेस्क्यू कराया। इन बच्चों में अधिकतर बच्चे बिहार और नेपाल के थे।

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कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि साल 1982 में जब वह भदोही पहुंचे और उन्होंने देखा कि विश्वविख्यात कालीन बनाने वाले इस शहर में बच्चों से मजदूरी कराई जा रही है, तो वह रो पड़े। उन्होंने ठान लिया कि इन सभी बच्चों को इससे बाहर निकालना है। उन्होंने बचपन बचाओ आंदोलन शुरू किया। करीब दस साल तक लगातार काम करते हुए उन्होंने 30 हजार बच्चों को रेस्क्यू कराया। शुरू में कालीन और साड़ी उद्योग से जुड़े लोग उनके खिलाफ हो गए। उन पर हमले भी कराए गए। उन्हें उद्योग विरोधी बताया गया। इसके बाद अन्य व्यवसाय से जुड़े बच्चों को भी बाल मजदूरी से आजाद कराया गया।
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उन्होंने लोगों को समझाया कि वह किसी इंडस्ट्री के खिलाफ नहीं, बल्कि बाल मजदूरी के खिलाफ हैं। इस अभियान के दौरान सेवापुरी में गांधी आश्रम में वह अपने सहयोगियों के साथ बैठक करते थे। रेस्क्यू कराए गए कई बच्चों को उनके घर भेजा गया और कई को बनारस में रखकर शिक्षा दी गई।
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बच्चों को शिक्षित करने में गांधी विद्या संस्थान राजघाट के दो प्रोफेसर ने काफी मदद की। उन्होंने कहा कि दुनिया में जहां भी युद्ध हो रहे हैं, उन्हें रोक दिया जाए। युद्ध के दौरान दस दिन में जो कुछ खर्च होता है उसे बच्चों पर खर्च कर दिया जाए तो बच्चों से जुड़ी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी।

एआई से खतरा, सीक्यू विकसित करने की जरूरत

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि आज लोगों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के खतरों का मुकाबला करने के लिए दयालु बुद्धि विकसित करने पर काम करना होगा। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने विशेषज्ञों के साथ मिलकर इस पर काम शुरू कर दिया है। समाज में बढ़ते अलगाव का मुकाबला करने के लिए सीक्यू यानी कंपैशन कोशेंट (करुणा गुणांक) को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। जब हम दूसरों की समस्या को खुद की समस्या समझकर समाधान करेंगे, तभी काम बनेगा।

दीयासलाई यानी माचिस की तीली ही मेरी गुरु

नोबेल विजेता ने अपनी आत्मकथा दीयासलाई पर भी बात की। उन्होंने कहा कि दीयासलाई यानी माचिस की एक तीली खुद निस्वार्थ भाव से जलकर उजाला लाती है। यही मेरे जीवन की गुरु है। इसीलिए मैंने अपनी आत्मकथा को इसका नाम दिया। मेरे लिए करुणा से भरी दुनिया का मतलब है हमारी शासन से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं, तंत्र करुणा से प्रेरित हों। दूसरे की तकलीफ को अपना समझें और उनका समाधान करें और समस्याओं से जूझ रहे लोगों को अपनी तरह मानकर तकलीफों को दूर करें।
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