एनएमसीजी ने गलती स्वीकारी: राज्य सरकार ने असि को बताया नाला, एनजीटी ने कहा-तो गंगा को भी टैप करेंगे; गलतफहमी
वाराणसी में असि नदी को राज्य सरकार के दस्तावेजों में नाला बताए जाने के कारण उसकी टैपिंग किए जाने का मामला सामने आया है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने इस गलती को स्वीकार किया है। मामले में एनजीटी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या अब गंगा को भी टैप करेंगे? इस प्रकरण ने नदी संरक्षण और सरकारी दस्तावेजों पर सवाल खड़े किए हैं।
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राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के महानिदेशक ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सुनवाई के दौरान गलती स्वीकार की और कहा कि असि नदी को गलतफहमी में टैप किया गया था। राज्य सरकार की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में नदी को नाला बताया गया था।
इस पर एनजीटी की पीठ ने मौखिक टिप्पणी की और कहा कि ऐसी ही स्थिति रही तो कल गंगा को भी टैप कर दिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 18 जनवरी 2027 को होगी। महानिदेशक को अगले आदेश तक व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा गया है।
असि नदी की पहचान, उसके पुनरुद्धार और उसमें गिरने वाले सीवेज के प्रबंधन मामले में 13 अक्तूबर को सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की मौजूदगी वाली पीठ ने जाे सुनवाई की है उसके आदेश की प्रति शुक्रवार (16 अक्तूबर) को अपलोड की गई।
याचिकाकर्ता सौरभ तिवारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जुड़े। पीठ ने एनएमसीजी के महानिदेशक को प्रस्तुत तथ्यों के संबंध में छह सप्ताह के भीतर शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए। इससे पहले पीठ के समक्ष तलब महानिदेशक ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने एसटीपी की जो डीपीआर तैयार कराई थी उसमें असि को नदी की जगह नाला दर्शाया गया था इसलिए टैपिंग की अनुमति दी गई। एनजीटी ने पूछा कि 2016 के प्रावधानों के विपरीत टैपिंग की अनुमति कैसे दी गई। इस पर महानिदेशक ने बताया कि राज्य सरकार की डीपीआर और रिपोर्ट से गलतफहमी हुई। असि नदी में सीवेज का प्रवाह रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे।
टैपिंग हटाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। असि नदी के पुनरुद्धार का उद्देश्य केवल सीवेज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं बल्कि नदी में गंदे पानी के प्रवाह को रोकने और उसकी प्राकृतिक पहचान को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा है। सीवेज को एसटीपी से जोड़ने और टैपिंग हटाने के लिए समय सीमा भी तय होगी।
2024 में दाखिल हुई थी याचिका : याचिकाकर्ता सौरभ तिवारी ने वर्ष 2024 में एनजीटी के समक्ष वाराणसी की असि और वरुणा नदियों के पुनरुद्धार, एनजीटी की ओर से पूर्व में पारित आदेशों के अनुपालन को लेकर याचिका दाखिल की थी। इसी मामले की सुनवाई के दौरान असि नदी की टैपिंग, सीवेज प्रबंधन और गंगा की सहायक नदियों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई चल रही है।
भविष्य की परियोजनाओं में 5 साल की शर्त
एनएमसीजी के महानिदेशक ने एनजीटी को बताया कि भविष्य में गंगा की सहायक जलधाराओं और बरसाती नालों की टैपिंग की अनुमति देते समय डीपीआर में समय सीमा तय की जा रही है। शर्त रखी जा रही कि संबंधित क्षेत्र के सभी सीवेज नेटवर्क को पांच साल के अंदर एसटीपी से जोड़ दिया जाए। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद टैपिंग हटाने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होगी।
नदी में गिरने वाले सीवेज को एसटीपी से जोड़ने का आश्वासन
सुनवाई के दौरान एनएमसीजी के महानिदेशक ने पीठ को आश्वासन दिया और कहा कि असि नदी क्षेत्र में गिरने वाले सीवेज को एसटीपी से जोड़ा जाएगा। इस सिलसिले में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की जाएगी। असि नदी जैसी ही गलतफहमी झारखंड और पश्चिम बंगाल में भी हुई जहां की राज्य सरकारों ने डीपीआर में सहायक नदियों को नाला बताया था।
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