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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Next week is very special for the worship of ancestors, coincidence of Magha Nakshatra and Trayodashi Tithi

पितरों की पूजा के लिए अगला सप्ताह बेहद खास, मघा नक्षत्र और त्रयोदशी तिथि का बन रहा संयोग

Sun, 13 Sep 2020 11:05 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sun, 13 Sep 2020 11:05 AM IST
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Next week is very special for the worship of ancestors, coincidence of Magha Nakshatra and Trayodashi Tithi
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पितरों की पूजा के लिए अगला सप्ताह बेहद खास रहेगा। 13 से 17 सितंबर तक हर दिन किए जाने वाले श्राद्ध का खास महत्व रहेगा। 15 सितंबर को मघा नक्षत्र और त्रयोदशी तिथि का संयोग बन रहा है। इस दिन किए गए श्राद्ध से पितरों को संतुष्टि मिलती है।

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ज्योतिषाचार्य गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि 16 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष में खास कारणों में विशेष श्राद्ध तिथि का विधान है। घर का कोई व्यक्ति संन्यासी बन गया है और उसके विषय में ज्ञात नहीं हो तो द्वादशी तिथि को श्राद्ध का प्रावधान है।
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जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु यानी जल में डूबने, विष के कारण, शस्त्र घात के कारण होती है ऐसे व्यक्तियों का श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए। वैसे तो जिस तिथि में पूर्वज की मृत्यु होती है उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है।

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एकादशी श्राद्ध-
13 सितंबर पितृ पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहते हैं। इस दिन श्राद्ध करने से उन पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष मिलता है जो किसी वजह से भटकती हैं। इस दिन व्रत करने से पितर प्रसन्न होते हैं। ये तिथि रविवार को है।

संन्यासी श्राद्ध-
14 सितंबर घर का कोई व्यक्ति संन्यासी बन गया हो और उसके बारे में कुछ पता नहीं हो तो द्वादशी यानी पितृ पक्ष की बारहवीं तिथि को उसका श्राद्ध करना चाहिए। इस दिन साधु-संतों का भी श्राद्ध किया जाता है। इस बार ये तिथि सोमवार को रहेगी।

मघा श्राद्ध-
15 सितंबर पितृ पक्ष के दौरान जब मघा नक्षत्र और त्रयोदशी तिथि का संयोग बनता है तब विशेष श्राद्ध किया जाता है। यमराज को मघा नक्षत्र का स्वामी माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों के लिए की गई विशेष पूजा करनी चाहिए। ये तिथि मंगलवार को रहेगी।

चतुर्दशी श्राद्ध-
16 सितंबर किसी इंसान की अकाल मृत्यु यानी दुर्घटना, जहर, हथियार या पानी में डूबकर हुई हो तो ऐसे लोगों का श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी यानी चौदहवीं तिथि को करना चाहिए। इससे उन पूर्वजों को संतुष्टि मिलती है। ये तिथि बुधवार को है।

अमावस्या श्राद्ध-
17 सितंबर परिवार के जिन लोगों की मृत्यु तिथि नहीं पता होती है। उनका श्राद्ध सर्व पितृ अमावस्या किया जाना चाहिए। इससे खानदान के भूले-भटके पितरों के प्रति कृतज्ञता जताई जा सके। इससे कोई भी पितर नाराज नहीं रहते। ये पर्व गुरुवार को रहेगा।

भगवान विष्णु की पूजा से भी संतुष्ट होते हैं पितृ देवता
13 सितंबर को अश्विन महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि है। इसे इंदिरा एकादशी कहा जाता है। श्राद्ध के दिनों में आने वाली ये एकादशी बहुत ही खास मानी जाती है। इस तिथि पर तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन करवाने से मृतात्माओं को मोक्ष मिलता है।

उपनिषदों में भी कहा गया है कि भगवान विष्णु की पूजा से पितृ संतुष्ट होते हैं। इस दिन भगवान शालिग्राम की पूजा और व्रत रखने का विधान है। कोई पूर्वज जाने-अनजाने में किए गए अपने किसी पाप की वजह से यमराज के पास दंड भोग रहे हों तो विधि-विधान से इंदिरा एकादशी का व्रत करने उन्हें मुक्ति मिल सकती है।

एकादशी पर आंवला, तुलसी, अशोक, चंदन या पीपल का पेड़ लगाने से भगवान विष्णु के साथ ही पितर भी प्रसन्न होते हैं। पद्म पुराण के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति के सात पीढि़यों तक के पितृ तर जाते हैं। पुराणों में बताया गया है कि जितना पुण्य कन्यादान, हजारों वर्षों की तपस्या और उससे अधिक पुण्य एकमात्र इंदिरा एकादशी व्रत करने से मिल जाता है।

एकादशी व्रत और पूजा विधि 
इस एकादशी के व्रत और पूजा की विधि अन्य एकादशियों की तरह ही है लेकिन सिर्फ अंतर ये है कि इस एकादशी पर शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस दिन स्नान आदि से पवित्र होकर सुबह भगवान विष्णु के सामने व्रत और पूजा का संकल्प लेना चाहिए। अगर पितरों को इस व्रत का पुण्य देना चाहते हैं तो संकल्प में भी बोलें।

इसके बाद भगवान शालिग्राम की पूजा करें। भगवान शालिग्राम को पंचामृत से स्नान करवाएं। पूजा में अबीर, गुलाल, अक्षत, यज्ञोपवीत, फूल होने चाहिए। इसके साथ ही तुलसी पत्र जरूर चढ़ाएं। इसके बाद तुलसी पत्र के साथ भोग लगाएं। फिर एकादशी की कथा पढ़कर आरती करनी चाहिए। इसके बाद पंचामृत वितरण कर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए। इस दिन पूजा तथा प्रसाद में तुलसी की पत्तियों का तुलसीदल का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है।

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