काशी की गलियों में भटका सपना: जापान जाने से पहले संत दर्शन को निकला नेपाली युवक कैसे बन गया लावारिस
Varanasi News: नेपाल के निरंजन पांडेय जापान में नौकरी के इंटरव्यू से पहले मिर्जापुर आश्रम दर्शन को आए थे। लौटते समय कथित तौर पर नशीला पदार्थ देकर उनका सामान लूट लिया गया। वाराणसी में अचेत मिले निरंजन की मदद समाजसेवी अमन कबीर ने की। पुलिस ने परिवार से संपर्क कराया। घटना से उनका जापान जाने का सपना टूट गया, लेकिन इंसानियत की मिसाल कायम हुई।
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जापान की एक बड़ी एयरपोर्ट निर्माण कंपनी में नौकरी का सपना लेकर नेपाल के काठमांडू से निकला एक युवक वाराणसी की गलियों में बेसहारा और अचेत हालत में मिला। जिंदगी की सबसे बड़ी उड़ान भरने से ठीक पहले उसके साथ जो हुआ, उसने सिर्फ उसके करियर को नहीं रोका, बल्कि यह भी दिखा दिया कि आस्था, इंसानियत और बदकिस्मती कैसे एक ही कहानी में साथ चल सकते हैं।
आध्यात्मिकता में डूबा युवक और अचानक बदली जिंदगी
काठमांडू निवासी निरंजन पांडेय का चयन जापान की एयरपोर्ट बनाने वाली कंपनी में हो गया था। 14 मई गुरुवार को उनका इंटरव्यू तय था। परिवार खुश था और भविष्य की नई उम्मीदें सामने थीं। लेकिन इसी बीच निरंजन का मन आध्यात्मिकता की ओर खिंच गया। उन्हें यथार्थ गीता पढ़ने में गहरी रुचि थी।
किताब पढ़ते-पढ़ते वह इतने प्रभावित हुए कि जापान जाने से पहले मिर्जापुर के शक्तेशगढ़ स्थित स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के आश्रम में दर्शन करने का विचार बना लिया। इसी उद्देश्य से वह काशी पहुंचे और वहां से परमहंस आश्रम जाकर स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के दर्शन किए। दर्शन के बाद वह वापस वाराणसी लौट रहे थे, लेकिन रास्ते में उनकी जिंदगी ने अचानक ऐसा मोड़ लिया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
ऑटो चालक ने दिया नशीला पदार्थ, सड़क पर मिले अचेत
दर्शन के बाद लौटते समय एक ऑटो चालक ने कथित तौर पर निरंजन को नशीला पदार्थ खिलाकर बैग व मोबाइल लूट ली। इसके बाद वह दारानगर इलाके में अचेत अवस्था में पाए गए। जब उन्हें होश आया तो उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ चुकी थी। वह ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। सदमे और मानसिक तनाव में डूबे निरंजन महामृत्युंजय मंदिर की चौखट पर घंटों गुमसुम बैठे रहे।
उधर, राह चलते लोग उन्हें देखते रहे, लेकिन किसी ने उनकी हालत को समझने की कोशिश नहीं की। तभी असहाय और लावारिस लोगों की मदद करने वाले समाजसेवी अमन कबीर की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने निरंजन से बात करने की कोशिश की, लेकिन वह स्पष्ट जवाब देने की स्थिति में नहीं थे।
अमन कबीर निरंजन को अपने साथ ले गए और उनकी देखभाल शुरू की। धीरे-धीरे जब उनकी स्थिति कुछ सामान्य हुई तो उन्हें जैतपुरा थाना ले जाया गया। वहां निरंजन ने टूटी-बिखरी हालत में अपनी पूरी व्यथा बताई। उन्होंने बेंगलुरु में काम करने वाले अपने बड़े भाई चित्र पांडेय का ईमेल पुलिस को दिया। पुलिस ने ईमेल के जरिए चित्र पांडेय से संपर्क किया। छोटे भाई की हालत सुनते ही चित्र पांडेय बिना देर किए 13 मई को वाराणसी पहुंच गए। दूसरी ओर, अमन कबीर ने निरंजन को सारनाथ के हिरामनपुर स्थित काशी कुष्ठ सेवा संघ में रखा और लगातार उनकी सेवा करते रहे।
भाई से मिलते ही छलक पड़े आंसू
जब चित्र पांडेय आश्रम पहुंचे और उन्होंने अपने छोटे भाई को देखा तो खुद को रोक नहीं सके। दोनों भाई एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। कुछ देर बाद जब माहौल सामान्य हुआ तो चित्र पांडेय ने अमन कबीर का हाथ पकड़कर उनका आभार जताया। उन्होंने कहा कि नेपाल हमेशा से भारत का छोटा भाई रहा है, लेकिन आज इस रिश्ते पर सच्ची मुहर लग गई। जिस तरह से अमन कबीर ने उनके छोटे भाई की देखभाल की, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
टूट गया जापान जाने का सपना
चित्र पांडेय ने बताया कि उनके पिता मोहनराज पांडेय काठमांडू में शिक्षक थे और अब रिटायर हो चुके हैं। मां गृहणी हैं। परिवार में सबसे बड़े चित्र खुद बेंगलुरु की एक मेडिकल कंपनी में काम करते हैं, जबकि छोटा भाई निरंजन अपने करियर की सबसे बड़ी शुरुआत करने जा रहा था। 14 मई को जापान की कंपनी में उसका इंटरव्यू था, लेकिन इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उसके करियर पर अचानक ब्रेक लगा दिया। हालांकि परिवार इस बात से राहत में है कि वह सुरक्षित मिल गया और बाबा विश्वनाथ की नगरी तथा बुद्ध की तपोस्थली में उसे इंसानियत का सहारा मिला।
काशी से नेपाल तक साथ गई इंसानियत की कहानी
गुरुवार को चित्र पांडेय अपने भाई के साथ सारनाथ घूमने गए। इसके बाद दोनों नेपाल के लिए रवाना हो गए। जाते-जाते चित्र पांडेय ने अमन कबीर को ढेरों शुभकामनाएं दीं और कहा कि जिंदगी में ऐसे लोग ही उम्मीद को जिंदा रखते हैं। यह कहानी सिर्फ एक युवक के टूटे सपने की नहीं है। यह उस दौर की तस्वीर भी है जहां एक तरफ इंसान चंद पैसों के लिए किसी की जिंदगी तबाह कर देता है, तो दूसरी तरफ कोई अनजान व्यक्ति बिना किसी रिश्ते के किसी की जिंदगी संभालने में जुट जाता है। सवाल यही है कि आखिर समाज की असली पहचान किससे बनती है — धोखे से या इंसानियत से?