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बलिका दिवस: बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को मिला बल, बनारस में 1000 पुरुषों के मुकाबले 926 बेटियां

Sun, 24 Jan 2021 02:09 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sun, 24 Jan 2021 02:09 PM IST
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National Girl Child Day: beti bachao beti Padhao campaign is getting strength
National girl day

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को बढ़ावा देने की सरकार की पहल का असर दिखने लगा है। वहीं, बदलते समय के साथ ही लोगों की सोच में भी बदलाव आने लगा है। पहले जहां लोग बेटियों को बोझ मानते थे, वहीं इस तरह की मानसिकता रखने वालों की संख्या में भी कमी आई है। बेटों की तुलना में जिले में धीरे-धीरे बेटियों के जन्म का अनुपात भी बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, जिले में 2018 में जहां 42248 बेटियों का जन्म हुआ था, वहीं 2019 में एक हजार संख्या बढ़ गई और 2020 में भी इजाफा हुआ है।

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लोगों की बदलती सोच का ही असर है कि समाज के हर क्षेत्र में बेटियां अपने दम पर नए कीर्तिमान हासिल कर रही हैं। यह उन लोगों के लिए अच्छा संदेश है जो बेटे-बेटी में भेदभाव जैसी बात सोचते हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए बहुत सी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इसके लिए डाक विभाग, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सहित अन्य विभागों की ओर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूक भी किया जा रहा है। 
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हर क्षेत्र में आगे हैं बेटियां 
बेटियां समाज में हर क्षेत्र में आगे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सेना, उद्योग जगत, खेल, रेलवे, हवाई सेवा आदि क्षेत्रों में मान बढ़ा रही हैं, अब उससे हर तरफ सराहना हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लोगों से बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। काशी में अब हर साल बेटियों के जन्म का अनुपात भी जिस तरह से बढ़ रहा है, यह लोगों के सकारात्मक सोच का परिणाम है।

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तीन साल में बेटियों का जन्म का आंकड़ा
2018          42248
2019          43533
2020          43573
(स्वास्थ्य विभाग की ओर से दर्ज आंकड़े)

बेटों के मुकाबले बेटियों का अनुपात
 वर्ष         बालक                   बालिका
  2018    1000        925
  2019    1000        924
  2020    1000        926

बेटियों के लिए हैं ये योजनाएं
-सुकन्या समृद्धि योजना
-बालिका समृद्धि योजना
-कन्या सुमंगला योजना
-भाग्य लक्ष्मी योजना
-सीबीएसई छात्रवृत्ति योजना

यह सुखद है कि बेटियों का जन्म प्रतिशत बढ़ रहा है। विभाग की ओर से चलाई जाने वाली योजनाओं के माध्यम से भी बेटी बचाने के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। बेटियों के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। -डॉ.एके मौर्या, प्रभारी सीएमओ

जल्द दिखेंगे सकारात्मक परिणाम
लोगों की सोच में भी बदलाव आ रहा है। इसका सकारात्मक परिणाम जल्द ही देखने को मिलेगा। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के साथ ही कई आकर्षक उपहार भी बेटियों के जन्म पर मिलने लगे हैं। समाज में अब भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनके सोच को बदलना बहुत जरूरी है। कुछ लोग बेटा-बेटी को बराबर मानने वाले हैं। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो बेटियों को बोझ मानता है। एकीकृत सोच होना बहुत जरूरी है। इसकी शुरुआत कहीं और से नहीं बल्कि परिवार से ही करनी होगी। -प्रो. श्वेता प्रसाद, समाजशास्त्र विभाग, बीएचयू 

पीसीपीएनडीटी एक्ट का कड़ाई से हो रहा पालन
बेटों के मुकाबले बेटियों का अनुपात बढ़ना बड़ी खुशखबरी है। खासकर इस परिस्थिति में जब कुछ लोग बेटियों को बोझ मानते हैं। पहले जहां अस्पतालों, जांच केंद्रों पर कन्या भ्रूण की जांच हो जाती थी, वहीं अब इस पर रोक लगाने के लिए पीसीपीएनडीटी एक्ट(पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम) का कड़ाई से पालन होने लगा है। शायद यही वजह है कि अब बेटियों का जन्म प्रतिशत भी बढ़ रहा है। -डॉ. शिप्रा धर, स्त्री रोग विशेषज्ञ

दो बेटियों के बाद ही करा ली नसबंदी
परिवार नियोजन के लिए दो बच्चों के जन्म के बाद ही नसबंदी करा लेने के प्रति जागरूक किया जाता है। इसके प्रति भी जागरूकता बढ़ने लगी है। अब बेटियों के प्रति प्रेम कहें या परिवार नियोजन के नियमों का पालन। आम तौर पर ऐसे लोग भी होते थे जो दो बेटी अगर पैदा हो गई तो तीसरे में बेटे की चाहत रखते हैं, लेकिन अब इस तरह की मानसिकता भी बदल रही है। बहुत से ऐसे माता-पिता भी हैं, जो दो बेटियों के जन्म के बाद ही नसबंदी करा ले रहे हैं। बदलती सोच का इससे बेहतर परिणाम और नहीं हो सकता है। - डॉ. लिली श्रीवास्तव, एसआईसी, महिला अस्पताल

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