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‘नरकट की रानी’ डाक्यूमेंट्री और पुस्तक का हुआ लोकार्पण
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 25 Apr 2018 10:23 AM IST
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भोजपुरी अध्ययन केंद्र में हुआ वरिष्ठ छायाकार अनिरुद्ध पांडेय की डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन
- फोटो : अमर उजाला
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बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र पर मंगलवार को आयोजित जनपद और सिनेमा सीरीज में वरिष्ठ छायाकार अनिरुद्ध पांडेय की डाक्यूमेंट्री ‘नरकट की रानी’ का प्रदर्शन किया गया। डाक्यूमेंट्री में बिहार के हथुआ में नरकट से बांसुरी बनाने वाले परिवार की कहानी है। इस दौरान उनके चित्रों की प्रदर्शनी के साथ ही पुस्तक का लोकार्पण सुप्रसिद्ध कवि ज्ञानेंद्र पति और अन्य अतिथियों ने किया।
राहुल सभागार में हुए कार्यक्रम में ज्ञानेंद्र पति ने पांडेय के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि कला मन को झिझोड़ती भी है और आनंदित भी करती है। उन्होंने फिल्म को भावों के द्वंद्व की कथा बताया और कहा कि इस कहानी में संवेदना के बृहत्तर आयाम समाहित हैं। द्वापर में कान्हा की मुरली से जोड़ते हुए उन्होंने इसे चित्तवृत्त की कथा के रुप में रेखांकित करते हुए कहा कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक और दस्तावेजीकरण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
साहित्यकार डॉ. रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि मीडिया, बाजार और व्यापार के बढ़ते प्रभाव के बीच डाक्यूमेंट्री में हाशिये के समाज का मर्मांतक संगीत दिखाया गया है। न्याय के अभाव में छटपटाते समाज की गहरी प्रतिध्वनि डाक्यूमेंट्री में देखी जा सकती है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी सुभाष चंद्र यादव ने कहा कि यह फिल्म हमारे जीवन के प्रतिमान के रूप में दिखाई पड़ती है।
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विशिष्ट अतिथि अमर उजाला के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी ने डाक्यूमेंट्री को ‘गुदड़ी के लाल’ की खोज बताया। कहा, फिल्म तप, ताप और तपस्या की कथा है जिसे उकेरना पत्रकारिता और मीडिया का प्रथम दायित्व है। डाक्यूमेंट्री संबंधित समाज के दर्द को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ मनुष्यता का वृतांत भी रचती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष काशी विद्यापीठ के मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि बांसुरी बनाना लोक कला है। ‘नरकट की रानी’ दूसरों के आनंद के लिए बांसुरी बनाती है। यह फिल्म भारतीय परिवार के सामुदायिक थाती को व्यक्त करती है और इसमें सामुदायिक श्रम का भाव दिखता है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि अनिरुद्ध पांडेय ने न केवल शब्दों को चित्रों में ढाला है बल्कि उसे एक आकार भी दिया है। संचालन शोध छात्र रुद्र प्रताप सिंह और धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्रा डॉली मेघनानी ने किया।
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राहुल सभागार में हुए कार्यक्रम में ज्ञानेंद्र पति ने पांडेय के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि कला मन को झिझोड़ती भी है और आनंदित भी करती है। उन्होंने फिल्म को भावों के द्वंद्व की कथा बताया और कहा कि इस कहानी में संवेदना के बृहत्तर आयाम समाहित हैं। द्वापर में कान्हा की मुरली से जोड़ते हुए उन्होंने इसे चित्तवृत्त की कथा के रुप में रेखांकित करते हुए कहा कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक और दस्तावेजीकरण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
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साहित्यकार डॉ. रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि मीडिया, बाजार और व्यापार के बढ़ते प्रभाव के बीच डाक्यूमेंट्री में हाशिये के समाज का मर्मांतक संगीत दिखाया गया है। न्याय के अभाव में छटपटाते समाज की गहरी प्रतिध्वनि डाक्यूमेंट्री में देखी जा सकती है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी सुभाष चंद्र यादव ने कहा कि यह फिल्म हमारे जीवन के प्रतिमान के रूप में दिखाई पड़ती है।
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विशिष्ट अतिथि अमर उजाला के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी ने डाक्यूमेंट्री को ‘गुदड़ी के लाल’ की खोज बताया। कहा, फिल्म तप, ताप और तपस्या की कथा है जिसे उकेरना पत्रकारिता और मीडिया का प्रथम दायित्व है। डाक्यूमेंट्री संबंधित समाज के दर्द को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ मनुष्यता का वृतांत भी रचती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष काशी विद्यापीठ के मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि बांसुरी बनाना लोक कला है। ‘नरकट की रानी’ दूसरों के आनंद के लिए बांसुरी बनाती है। यह फिल्म भारतीय परिवार के सामुदायिक थाती को व्यक्त करती है और इसमें सामुदायिक श्रम का भाव दिखता है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि अनिरुद्ध पांडेय ने न केवल शब्दों को चित्रों में ढाला है बल्कि उसे एक आकार भी दिया है। संचालन शोध छात्र रुद्र प्रताप सिंह और धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्रा डॉली मेघनानी ने किया।